पूर्णियाँ के बनमनखी में अप्रैल माह में हर साल लगता है पत्ता मेला, यहाँ लड़के लड़कियों को जीवन साथी चुनने की है छूट,तुरंत यहीं शादी भी!

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रिपोर्ट- आकाश कुमार!

कुंवारों को पूरे साल रहता है मेले का इंतेजार; बिहार- बंगाल- झारखंड से लेकर नेपाल तक ‘पत्ता मेले’ का क्रेज

, 40 फीट ऊंचे बांस की बल्ली से बंधकर शिव भक्ति साबित करने की परंपरा

यूं तो आपने कई मेले घूमे हैं. मगर शायद ही आप देश के ऐसे अनोखे मेले के बारे में जानते होंगे. जिसका इंतेजार कुंवारे बड़ी ही बेसब्री से पूरे साल करते हैं. मेले में आने वाले लड़के और लड़की की आंखे चार हुईं. तो फिर प्रपोजल के लिए लंबा -चौड़ा इंतेजार नहीं करना पड़ता. मेले में पसंद आई लड़की घर वालों की रजामंदी से लड़के के साथ चली जाती है. और फिर दोनों की चट मंगनी और पट ब्याह करा दी जाती है. यही वजह है कि पूर्णिया के बनमनखी में लगने वाले पत्ता मेले का क्रेज न सिर्फ बिहार बल्की बंगाल और झारखंड के अलावा नेपाल में भी बढ़ती चली जा रही है.

पूर्णिया के बनमनखी प्रखंड के कोसी शरण देबोतर पंचायत के मलिनिया दियारा मगांव में लगने वाला यह मेला हर साल ही प्रचंड गर्मी के बीच अप्रैल महीने में लगाई जाती है. इसके पीछे का एक कारण शिव भक्ति साबित करने से जोड़कर देखा जाता है. आदिवासियों के इस प्रसिद्ध मेले को लोग पत्ता मेले के नाम से जानते हैं. मेले में आए लड़के और लड़की को अपनी पसंद चुनने की छूट होती है. देश के इस अनोखे मेले में आने के लिए हर एक दिल तब तक धड़कता रहता है, जब तक उसकी शादी नहीं हो जाती.

दैनिक भास्कर डिजिटल से बातचीत में आदिवासी समाज के। बताते हैं कि पत्ता मेले की शुरुआत बैसाखी सिरवा त्योहार से होती है. मेले का इतिहास 150 साल से ज्यादा पुराना है. प्रेम और भक्ति की पराकाष्ठा को लांघने वाला यह मेला 4 दिनों तक चलेगा. इस दौरान उनके इस प्रसिद्ध पत्ता मेले को देखने बिहार, बंगाल, झारखंड और ओडिसा जैसे राज्यों के अलावा नेपाल के लोग भी पहुंचते हैं. बेहतर व्यवस्था और मुकम्मल परिवहन सेवा के अभाव के बावजूद इन जगहों से आने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है.
यहां रोजाना 30-40 हजार लोग पहुंच रहे हैं. कई आए तो कुंवारे मगर गए ‘जोड़ा फूल’ बनकर.

मेले के आयोजकों में रहे आदिवासी जाति के प्रमुख स्थानीय नेता व पूर्व मुखिया कहते हैं कि मैंने अपने आंखों के सामने ने जानें कितने लोगों को इजहार और फिर शादी के बंधन में बंधते देखा. वे बताते हैं मेले में आए लड़के को जो लड़की पसंद आ जाती है, तो फिर उसे वह प्रपोज करने के लिए पान खाने का ऑफर भेजता है. अगर लड़की ने लड़के का दिए पान का प्रपोजल एक्सेप्ट कर लिया तो फिर आपसी रजामंदी से लड़का उस लडकी को अपने साथ लेकर घर चला जाता है. इसके कुछ दिनों दोनों की शादी करा दी जाती है.
हालांकि यह शर्त भी तब लागू होती है कि उन्हें यह शादी आदिवासी परंपरा से करनी होती है. और प्रकृति को अपना आराध्य देव मानना होता है. वहीं मेले में पसंद करने के बाद विवाह से इनकार करने वालों के लिए आदिवासी समाज के विधान के मुताबिक कड़े दंड का प्रावधान है.

वहीं इस मेले का इंतेजार न सिर्फ कुंवारों को होता है. बल्की मेले का इंतेजार शिव के साधकों को भी बड़ी ही बेसब्री से होता है. 150 साल पूर्व से यह मेला चला आ रहा है. इसमें महादेव और पार्वती की पूजा अर्चना की जाती है. इस दौरान मेले का खास आकर्षण 40 फीट लंबी बांस की बल्ली से बंधा शिवभक्त होता है. जिसे अपनी भक्ति साबित करने के लिए 40 फीट की ऊंचाई से नीचे दिख रही धरती की परिक्रमा कराई जाती है. ऐसी मान्यता है कि पौराणिक समय में भगवान शिव और मां पार्वती को प्रसन्न करने के लिए मेले के दौरान 4 दिनों तक पूजा -अर्चना की जाती है. भक्त और साधक 3 दिनों तक उपवास करते हैं बांस के बल्ली से बंधकर शिवभक्त अपने भक्ति की अग्निपरीक्षा देते है. भक्त खुद को भगवान को समर्पित कर देतें है. वहीं इस मेले के आयोजक पीताम्बर टुड्डू कहते हैं कि यह सत्य का प्रतीक है.

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