ये पेट की आग है बाबू ,हर हाल में इसे बुझाना है!

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कार्यकारी संपादक पंकज कुमार ठाकुर

बढ़ते कोरोनावायरस को देखते हुए प्रशासनिक महकमे ने पूरी तरह से लॉकडाउन का आदेश पारित किया है। हालांकि इस बीच सुबह 6:00 बजे से 10:00 बजे तक शहरी क्षेत्र की दुकानें खुलेगी तो ग्रामीण क्षेत्रों की सुबह 8:00 बजे से 12:00 बजे तक, अब ऐसे में कानून व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी पुलिस महकमे को दी गई है। दरअसल लॉकडाउन के नाम पर डंडा भांजती पुलिस कभी पत्रकारों को अपना निशाना बना रहे हैं तो कभी दो जून की रोटी कमाने वाले मजदूरों को । ठीक है किसी ने कानून का उल्लंघन किया तो कोरोना गाइडलाइन के तहत उसे जुर्माना किया जा सकता है। लेकिन सवाल अब यह उठता है कि आए दिन ऐसी ही घटना को लेकर अखबार की सुर्खियां लंबी चौड़ी दिखाई पड़ना कहां तक न्यायोचित है? कमोवेश पूरे बिहार की स्थिति यही बनी हुई है। जहां लॉकडाउन के नाम पर डंडा चलाने का लाइसेंस। अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर इस कोरोना कालखंड में रेहड़ी पटरी और छोटे दुकानदारों के लिए दिहाड़ी मजदूरों के लिए क्या बिहार में कम्युनिटी किचन से इन सभी का गुजारा हो जाएगा? दरअसल इसकी सीधे तौर पर गुनहगार है वह सरकारी बाबू जिनके नकारे पन के कारण योजनाएं फाइलों में दम तोड़ गई।
अब ऐसे में अगर इन लोगों को घर बैठे जुगाड़ दे दिया जाए तो लाजमी है कोरोना वायरस खत्म हो जाएगा। तथा आगे आना होगा समाज के उन ठेकेदारों को जो खुद को समाज के ठेकेदार स्थापित कर रहे हैं। ऐसे में उनकी जिम्मेवारी बनती है कि आगे आकर इस समय वह बिल्कुल सरकार के साथ खड़े रहे। हालांकि आपको जिले में कई ऐसे अधिकारी मिल जाएंगे जिनको जिले में डंडे की जरूरत ही नहीं पड़ी। खैर चलिए आगे बढ़ते हैं। ठीक है बाबू लॉक डाउन कीजिए लेकिन आज भी ऐसे लोग हैं, जिनका रोज कमाना मजबूरी है। अगर एक दिन वह मजदूर चौक पर दस्तक नहीं दे तो अगले दिन उसके घर चूल्हा नहीं जलेगा। यह उसकी बेबसी, लाचारी है। और उसकी मां से पूछिए जिसकी ममता नीर बहा जाती है।
यह पेट की आग है बाबू इसे तो बुझाना है।

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