पुरुष का अछूता पहलू, प्रहार करती एक कविता!

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रचना – अनमोल कुमार

पुरुष हो ।
कैसे कहोगे ?
कैसे कहोगे कि
बाहर निकलने पर
कितनी धूप , कितनी धूल
कितनी भीड़ ,कितने शोर ,
से सामना होता है प्रतिदिन ।

दुकान पर ग्राहकों की चिकचिक,
आफिस में बॉस की झिकझिक
लोकल ट्रेन में भीड़ का हाल
बजट की चिंता में गिरते हए बाल
कैसे कहोगे
सब किस तरह झेलते हो प्रतिदिन ।

गृहस्थी को ढोने में ढलकते काँधे
बच्चों को पढ़ाने में अपने खर्च बाँधे
सहता अकेला ही, कुछ भी न बोलकर
किसको दिखाए वो अपना दिल खोलकर
कैसे कहोगे
क्या क्या छुपाया है सबसे प्रतिदिन ।

अपमान , गुस्सा , डांट और अवसाद
सब कुछ पी गए कर बच्चों को याद
फिर भी घर आकर तुम मुस्कुराते हो
आते-आते वेणी भी साथ में लाते हो
कैसे कहोगे
तुम घर में खपती हो मैं बाहर खप जाता हूँ
तुम घर संभालती हो, मैं बाहर बंट जाता हूँ।

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