विश्व पर्यावरण दिवस पर समर्पित,मुश्किल में हर सांस

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रचना – अनमोल कुमार

प्रकृति का छोड़ें हम शोषण
प्रकृति किया है सबका पोषण,
अजीब तुम्हारी दिनचर्या है
लौटाते हो सिर्फ प्रदूषण ,
प्रकृति का करो अब पोषण ।

नदियों को अविरल बहने दो
पैदल चलो पहाड़ों में,
पर्वत को पर्वत रहने दो
बांटों नहीं दरारों में ।
गिरि को गिराने में जुटे रहे
फिर आएंगी कैसे गिरिजा,
अक्षुण्ण रहा हिमालय गर
तो मिलेंगे नित शिव- गिरिजा ।

नित काटोगे वन – उपवन को
उद्यान का करोगे सत्यानाश,
प्राणवायु पर प्रश्न चिन्ह लगेगा
मुश्किल में होगी हर सांस ।

सोखोगे यमुना को
कहीं कदंब नहीं होगा,
कहां झूलेंगे कृष्ण- कन्हैया
जब वृंदावन नहीं होगा ।

जलस्रोतों को नहीं करें बर्बाद
भागीरथ ने किया था आबाद,
समंदर को सम्मान मिला था
श्रीराम ने किया था संवाद ।

नहीं करें जंगल को जर्जर
जंगल भी आवास है,
लाखों पशु – पक्षियों का
इसमें वास है, प्रवास है।

वन ने ही आश्रय दिया था
सीता, लक्ष्मण,श्रीराम को,
अज्ञातवास में आश्रय दिया था
हस्तिनापुर के पांडवजन को।

वन की रक्षा करने का
फिर लें हम सब संकल्प,
चुकाएं अहसान पुराना
बचा नहीं कोई विकल्प

पर्यावरण का करें सरंक्षण
प्राण का होगा नित संवर्द्धन,
नहीं करें प्रकृति का शोषण
सभी करें प्रकृति का पोषण ,
सभी करेंगे प्रकृति का पोषण।

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