समय का पहिया रफ्तार पकड़ रहा है, लेकिन कुम्हारों के चाक की रफ्तार धीमी ही है!

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संतोष तिवारी की रिपोर्ट :-

मिट्टी के दियें बनाने वाले कुम्हारों की जिंदगी है कितनी रोशन, कितने बदले आर्थिक हालात, बिहार के मुजफ्फरपुर संतोष तिवारी की खास रिपोर्ट

दिवाली में मिट्टी का दीया समेत अन्य बर्तन बनाने वाले कुम्हारों की अपनी पीड़ा है. इनकी मानें, तो वक्त बदला, लेकिन कुम्हारों की हालत नहीं बदली. आज भी कुम्हार आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं. पुराने चाक, मिट्टी, लकड़ी का जुगाड़ कर दीया व बर्तन बनाने में मेहनताना भी नहीं निकल पाता है. बाजार में सस्ते दीये के कारण उनकी कमाई फीकी पड़ गयी है. वे कहते हैं कि सरकार से भी उन्हें कोई मदद नहीं मिल पाती है. कुम्हारों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं वक्त के साथ काफी चीजें बदली हैं, लेकिन मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हारों की जिंदगी जस की तस है. इनकी आर्थिक स्थित आज भी ज्यादा नहीं बदली. समय का पहिया रफ्तार पकड़ रहा है, लेकिन कुम्हारों के चाक की रफ्तार धीमी ही है. दस साल पहले जिस दाम पर दीया बिकता था, बढ़ती महंगाई के बाद भी आज भी उसी दाम में दीया बिक रहा है. पुराने चाक से ही बना रहे मिट्टी के बर्तन व मिट्टी के दियें मुजफ्फरपुर के ब्राह्मपुरा लक्ष्मी चौक निवासी मो इसराइल समय का पहिया रफ्तार पकड़ रहा है, लेकिन कुम्हारों के चाक की रफ्तार धीमी ही है.ने कहा कि उनके पूर्वज जिस तकनीक (चाक) से मिट्टी का दीया समेत अन्य बर्तन बनाते थे. वे लोग भी उसी पुराने चाक से काम कर रहे हैं और मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं. आधुनिक युग में भी हाथ से चाक चलाना पड़ रहा है. आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है कि वे बिजली से चलने वाला इलेक्ट्रिक चाक ले सकें. बैंक से लोन भी नहीं मिल पाता, सरकार की कोई योजना इनकी जिंदगी में बदलाव नहीं ला पायी,

बाइट:- मो इसराईल मिट्टी के दियें बनाने वाला

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