भोजपुरी लोकगीतों की सहजता, स्वाभाविकता और सच्चाई इसकी पीड़ा को वैश्विक बना देती है

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ब्यूरो रिपोर्ट शंखनाद!

जय प्रकाश विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. फारुक अली ने वरिष्ठ पत्रकार, रंगकर्मी और साहित्यकार डॉ. अमित रंजन की भोजपुरी लोकगीतों के वैशिष्ट्य, समृद्धि और व्यापकता पर शोध परक आलोचनात्मक पुस्तक “लोक चेतना के स्वर” का लोकार्पण विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में सम्पन्न एक सादे समारोह में किया।

लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए कुलपति प्रो. फारुक अली ने कहा कि भारतीय संस्कृति अत्यंत समृद्ध है क्योंकि यह लोक और प्रकृति से गहरे अनुस्यूत है। यह लोक अपने समस्त वैभव के साथ अमित रंजन की पुस्तक लोक चेतना के स्वर में उपस्थित है।

समारोह को संबोधित करते हुए हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. अजय कुमार ने मुख्य रूप से लोक साहित्य और संस्कृति के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा के की आज का समय अर्थ प्रधान होता जा रहा है भौतिक भौतिकवाद अपने चरम पर पहुंच रहा है ऐसे में लोकजीवन लोक साहित्य और लोक संस्कृति की चिंता और सरोकार काफी मायने रखती है अमित अमित जी की पुस्तक लोक चेतना के स्वर में इसी लोक संस्कृति और लोक साहित्य को देखने दिखाने की एक सार्थक कोशिश की गयी है।

इसके कवल लेखक डॉ. अमित रंजन ने किताब की भाव भूमि रखते हुए कहा कि भोजपुरी लोकगीत के बारहमासा, जँतसार, बंध्या बिधवा विलाप के गीतों में व्यक्त विरह वियोग, पीड़ा और आँसुओं की धार में न सिर्फ भोजपुरिया समाज और भोजपुरी की समझ रखने वाले अन्य भाषा भाषी बल्कि अंग्रेज ग्रियर्सन से ले कर बंगली, असमिया, मराठी, मद्रासी तक बह जाते हैं। इन गीतों की विरहणी का दर्द वैश्विक स्तर धरातल पर अनुभूत होता है।
डॉ. अमित ने कहा कि भोजपुरी लोकगीतों में ग्रामीण कवियों के भावों की सहजता और स्वाभाविकता गैर भाषा- भाषियों के हृदय में भी गहराई से उतरती है और शब्दों से भिज्ञ न होते हुए भी वे इन गीतों की भाव सरिता के बहाव में बहते चले जाते हैं। इन गीतों की सच्चाई ठीक उस माँ की अनुभूति की तरह होती है जिसे यह बताना नहीं पड़ता कि बच्चा कब और किस कारण रो रहा है, भोजपुरी लोकगीतों की यही विशेषता उसकी स्थानीय पीड़ा और संताप को वैश्विक बना देती है।
लेखक ने कहा कि भोजपुरी लोकगीतों की उस शक्ति का स्रोत क्या है जो उसे स्थानीयता से अन्तर्राष्ट्रीयता की ओर ले कर चली जाती है, कैसे जानलेवा श्रम में भी लोक संगीत की रागिनी बज उठती है, कैसे किसी आदिम संस्कृति के सुख दुख, हर्ष विषाद, उमंग उत्साह, रीति रिवाज, सोच समझ, आस्था मान्यताओं आदि की अभिव्यक्ति न सिर्फ समाज विशेष को परिचालित और नियंत्रित करती है बल्कि अन्य समाजों को भी अपनी धारा में बहा ले जाती है।
डॉ. अमित ने कहा कि किसी विश्वविद्यालय के शोधार्थी की पुस्तक का उसके सीनेट हॉल में कुलपति और अन्य पदाधिकारियों के द्वारा लोकार्पण बहुत बड़ा सम्मान है जिसके लिए मैं अपने अभिभावकों माननीय कुलपति जी, प्रतिकुलपति जी, डीएसडब्ल्यू, डीन, सीसीडीसी, विभागाध्यक्ष सभी शिक्षकों के वातसल्यभाव के लिए नतमस्तक हूँ, सदैव आभारी रहूँगा।

समारोह को संबोधित करते हुए डीएसडब्ल्यू प्रो. उदय शंकर ओझा ने अंग्रेजी साहित्य के उपनिवेशवाद ओर भोगवाद की चर्चा करते हुए लोकसंस्कृति की महत्ता और उसकी वरेण्यता को प्रतिस्थापित किया।

समारोह को परीक्षा नियंत्रक प्रो. अनिल कुमार सिंह, कॉलेज निरीक्षक अमरेन्द्र कुमार झा आदि ने भी संबोधित किया। समारोह का संचालन प्रो. सिद्धार्थ शंकर और धन्यवाद ज्ञापन सीसीडीसी प्रो. हरिश्चंद जी ने की।

समारोह में प्रो. कमल जी की पोप्युलेशन एंड एग्रीकल्चर का भी विमोचन किया गया।

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