दफ्तर , बाजार,विकास बना कमाई का सबसे बड़ा जरिया!

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पंकज ठाकुर के साथ अश्वनी श्रीवास्तव

इनमें धोखे होते हैं इनमें सौदे होते हैं दफ्तर , बाजार विकास बना कमाई का सबसे बड़ा जरिया!

सिस्टम यही है यहां नेता से लेकर अधिकारी तक संतुलन में है!

(हम बोलेगा तो बोलेगा कि बोलता है)

इनमें धोखे होते हैं इनमें सौदे होते हैं यह दफ्तर है या बाजार शायद यह कहावत रजौन प्रखंड के हर पंचायत के मंथन के बाद कहीं ना कहीं आपको सत्य होगा दरअसल विकास अब कमाई के एक जरिया बन चुका है यहां नेता से लेकर अधिकारी तक संतुलन की स्थिति में रहते हैं। यदा-कदा जब संतुलन बिगड़ने लगता है तो महामहिम या तारणहार सौदा करवाते हैं बड़े प्रेम से जिसके बाद संतुलन फिर से बरकरार। और संतुलन की स्थिति है तो विकास कार्य तेजी से चलते रहता है। कहे तो कमीशन कमाई के अलावे भाई विकास की हवाबाजी भ्रष्टाचार उजागर होने का मतलब है। अचानक संतुलन खो जाना नए सिरे से असंतोष का जन्म लेना। दरअसल रजौन प्रखंड के कई पंचायत में इन दिनों मनरेगा विकास कार्य जोरों पर है। यानी योजना के साथ कमीशन भी टैब साहेब मुखिया जी से लेकर चपरासी तक कमीशन तय। ऐसे में कई मजदूर ऐसे हैं जिनका जॉब कार्ड पहले पंचवर्षीय में बनाया गया था। और अब उन्हें जॉब कार्ड संख्या तक मालूम नहीं, खाता संख्या मालूम नहीं। अब ऐसे में क्षेत्र में जब इतने जॉब कार्ड नहीं बने हैं। तो आखिर मजदूर साहिब कहां से मिल रहा है। दरअसल सूत्र बताते हैं कि पहले मनरेगा योजना की साहब के कार्यालय के बंद कमरे में जाकर मुखिया जी पंचायत समिति से लेकर सत्तासीन सरकार के छूट भैया नेता सौदा तय करते हैं। दरअसल आपको हम पहले ही बता चुके हैं सिस्टम लाचार और बेबस है। सूत्र यह भी बताते हैं कि इन दिनों मुखिया पीआरएस मनरेगा कार्यालय और दलालों की मिलीभगत से हो रहे कई जगह काम के लिए। जगह-जगह कई सीएसपी केंद्रों पर गांव देहातों में युद्ध स्तर पर मजदूरों का खाता खुलवाया जा रहा है। ताकि मुखिया की दिन दूनी और रात चौगुनी हो सके। कई मुखिया जी डिजिटल मीडिया के जरिए विकास कर रहे हैं। साहिब 10 माह में 10 कदम भी नहीं चल पाए हैं। तो कई पंचायतों में विकास मुखिया जी की दिन दूनी रात चौगुनी हो गई है। हालांकि कई जगह मुखिया से लेकर वार्ड पार्षद तक को आने वाले दिनों में भयानक जनाक्रोश ना झेलना पड़े। तो प्रखंड के कई पंचायतों में विकास मुखिया जी का तो दिख रहा है। लेकिन पंचायत जहां पर खड़ी थी उसे 50 वर्ष पीछे धकेल दिया गया।

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