राष्ट्र निर्माण की चेतना: श्यामा प्रसाद मुखर्जी और बाल गंगाधर तिलक के जीवन से प्रेरणा”!

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रिपोर्ट- अनमोल कुमार

नयी दिल्ली। श्यामा प्रसाद मुखर्जी और बाल गंगाधर तिलक– ये केवल नाम नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद के दो अद्वितीय स्तंभ हैं, जिन्होंने अपने विचारों, संघर्षों और तपस्या से भारत माता की सेवा का मार्ग प्रशस्त किया।
ये दोनों व्यक्तित्व राष्ट्र के लिए समर्पित राष्ट्रवादी, क्रांतिकारी और समाजसेवी थे, जिनका जीवन आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा-पुंज है।

भारतीय चरित्र निर्माण संस्थान द्वारा आयोजित यह 18 दिवसीय कार्यक्रम इन्हीं महापुरुषों के जीवन-संघर्ष, विचार और राष्ट्र-संस्कारों पर मंथन और चिंतन का एक पुनीत अवसर है।
इसका उद्देश्य है:
राष्ट्र सेवा हेतु स्वयं को तैयार करना” – आत्मानुशासन, सेवा और संस्कृति-रक्षा की भावना से ओतप्रोत होकर।

उनके विचार– सीधा संवाद, स्पष्ट आदेश
जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा –
“एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे,”
तो यह केवल नारा नहीं था, बल्कि भारतीय एकता और अखंडता की रक्षा का संकल्प था।

जब लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक गरजकर बोले –
“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूंगा,”
तो यह पराधीनता की जंजीरों को तोड़ने का उद्घोष था, जिसने जनमानस में चेतना की अग्नि प्रज्वलित कर दी।

इन दोनों के कथन किसी राजनीतिक भाषण नहीं, बल्कि राष्ट्र-हित में स्पष्ट और निर्भीक आदेश थे –
कि भारत की धरती पर कोई भी शक्ति, भारत की सनातन संस्कृति, सभ्यता, और गरिमा को तोड़कर अपना स्वामित्व नहीं जमा सकती।
भारत का नेतृत्व वही करेगा,
“जो निस्वार्थ भाव से राष्ट्र और उसकी परंपरा की रक्षा के लिए अपना जीवन अर्पित कर दे।”

गीता के सिद्धांत – उनके जीवन का आधार
इन दोनों महापुरुषों के जीवन में भगवद्गीता के कर्मयोग, निष्काम सेवा और धर्म परायणता के सिद्धांतों की झलक स्पष्ट दिखाई देती है:

कर्तव्यनिष्ठा में वे अर्जुन की तरह थे –जिन्होंने जीवन की सारी सुविधाओं का त्याग कर राष्ट्र के रण में उतरने को अपना धर्म माना।

साहस और आत्मबल में वे कृष्ण के उपदेशों के अमर संदेश वाहक बने – “न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्”– अर्थात कोई भी क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता।

आज की आवश्यकता: गीता का कर्म विज्ञान और शासन नीति
आज जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कर रहा है, तब हमारे नेतृत्व को, हमारी युवा पीढ़ी को आवश्यकता है –
गीता के कर्म ज्ञान और राष्ट्र-नीति को समझने की।

हमें समझना होगा:
कर्तव्य क्या है?

कर्म और सेवा में भेद कहाँ है?

शासन क्या है – और उसका उद्देश्य क्या है?

जिनके जीवन में नीति, सेवा और साहस का संगम है, वही इस राष्ट्र का सही निर्माता बन सकता है।

स्वामी कृष्णानंद झा
राष्ट्रीय महासचिव भारतीय चरित्र निर्माण संस्थान दिल्ली ने इस अवसर पर धन्यवाद ज्ञापित किया। रिपोर्ट अनमोल कुमार।

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