रिपोर्टर — राजीव कुमार झा!
मधुबनी जिले के कलुआही प्रखंड क्षेत्र में गुरुवार की सुबह से ही काफी चहल-पहल देखने को मिला। वही मुस्लिम समुदाय के लोगो ने अपने घरों और मस्जिदों की साफ़ सफ़ाई किया। बड़े बुजुर्ग और बच्चे अहले सुबह नहा धोकर तैयार होकर पाक साफ कपड़ा पहनकर अपने-अपने मुहल्ले कि मस्जिद में नमाज़ अदा किए। शब-ए-बारात मुस्लिम समुदाय के प्रमुख पर्वों में से एक है। शब-ए-बरात को इबादत की रात कहते हैं। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक, शब-ए-बारात शाबान महीने की 15 वीं तारीख की रात को मनाई जाती है। यह दीन-ए-इस्लाम का आठवां महीना होता है। इसे माह-ए-शाबान यानी बहुत मुबारक महीना माना जाता है। कहते हैं, जो शब-ए-बारात में इबादत करता है, उनके सारे गुनाह माफ हो जाते हैं। इसलिए लोग शब-ए-बारात में रात भर जागकर अल्लाह की इबादत करते हैं और अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं।
अल्लाह की इबादत का यह दिन बहुत ही खास और पाक तरीके से मनाते हैं। शब-ए-बरात के मौके पर मस्जिद और कब्रिस्तानों को खास तरीके से सजाया जाता है। कब्रिस्तान जाकर अपने पूर्वजों की कब्र पर सुरह फतिहा पढ़ कर मगफिरत की दुआएं मांगी जाती है। इसे चार मुकद्दस रातों में से एक मानते हैं, जिसमें पहली आशूरा की रात, दूसरी शब-ए-मेराज, तीसरी शब-ए-बारात और चौथी शब-ए-कद्र की रात होती है। इसके अलावा शब-ए-बारात पर घरों को विशेष रूप से सजाते हैं। मस्जिद में नमाज पढ़कर अल्लाह से गुनाहों की माफी मांगते हैं। घरों में लजीज पकवान जैसे, बिरयानी, कोरमा, हलवा आदि बनाया जाता है और इबादत के बाद गरीबों में बांटा जाता है।
शब का अर्थ है रात और बारात यानी बरी होना। इस आधार पर शब-ए-बारात गुनाहों की माफी मांगने और अल्लाह की इबादत कर अपने गुनाहों से तोबा करने की रात है। प्रतिवर्ष एक साल बाद शाबान महीने की 14 तारीख को सूर्यास्त के बाद शब-ए-बारात की रात शुरू होती है। इस रात दुनिया को छोड़कर जा चुके पूर्वजों की कब्रों पर उनके परिजन फातिहा पढ़ते हैं और उनके मगफिरत के लिए दुआ मांगी जाती है। सच्चे दिल से माफी मांगने और दुआ करने वाले लोगों के लिए अल्लाह जन्नत का दरवाजा खोलते हैं।




