रचना – अनमोल कुमार!
का बोलीं काथी ले अइहऽ
आँगन से माटी ले अइहऽ
दूध भरल मकई के दाना
होरहा खातिर मोटर चाना
बड़का अमरूदिया के टूसा
सोन्ह महक रहरी के भूसा
ईया के हाथे के खखोरी
नेउन लइहऽ एक कटोरी
दूध दही खाँटी ले अइहऽ
आँगन से माटी ले अइहऽ
ले अइहऽ तू गुल्ली डंटा
दोल्हा पाती खेल कुदन्ता
सूखल पतई के घिरनइया
कागज वाला छोटका नइया
टायर आ माचिस के खोंखा
ओका बोका तीन तरोका
बचपन के साथी ले अइहऽ
आँगन से माटी ले अइहऽ
पुअरा वाला एक चटाई
कोठरी में के छोट रजाई
दुअरा पर के घूर के धुआँ
जवना से भागेला कूहा
इहवाँ के गद्दा आ चद्दर
मन भावे ना सुइटर मफलर
गउवाँ से गाँती ले अइहऽ
आँगन से माटी ले अइहऽ
फगुआ में के कादो पांकी
बहुरा के भूँजा बा बाकी
पुपुही आ लट्टू के खेला
ले अइहऽ तू फगुनी मेला
खिचड़ी में के चिउड़ा लाई
दियरी वाला दीया सलाई
छठ वाला हाथी ले अइहऽ
आँगन से माटी ले अइहऽ




