बेबस और लाचार आंखें, खेवनहार की आस में!

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पंकज ठाकुर की रिपोर्ट !

(मुद्दा ये भी है)

देश के अन्नदाता किसान पर पूरे देश में सियासत परवान पर है।लोकसभा, विधानसभा से लेकर पंचायत चुनाव तक सब अपने आप को इनका तारणहार साबित करने में लगे हुए हैं। लेकिन अगर आप धरातल पर गौर करें तो सच्चाई खुद खुलकर सामने आ जाती है ,जहां किसानों की लाचार और बेबस आंखें तो मायूस चेहरा खुद सब कुछ बयां कर देता है। ‌ दरअसल एक सदी बाद भी किसानों का दर्द प्रेमचंद्र युगीन है। यह दीगर बात है कि आजादी के बाद हमने कई क्षेत्रों में तरक्की का नया आयाम स्थापित किया, लेकिन अन्नदाता की तकदीर और तस्वीर में कोई बदलाव नहीं आया। अब रही बात किसान बिल के नफा नुकसान का तो फिलहाल स्थानीय किसानों की समझ से परे है । लेकिन फिलहाल बिहार के कई जिले के किसानों को पैक्स के नकारे पन का नतीजा भुगतना पड़ रहा है।और फिलवक्त किसानों को मुनाफा तो छोड़िए घाटा ही घाटा है। दरअसल सरकार धान का समर्थन मूल्य 1868 रुपये क्विंटल बता रही है, लेकिन कई जिले के पैक्स को धान खरीदने का आदेश प्राप्त नहीं हुआ है। यह कह कर अधिकारी इधर से पल्ला झाड़ रहे हैं तो किसानों के आगे रवी की बुआई सबसे बड़ी विकराल समस्या बनी हुई है। जिस कारण अब बिचौलियों की नजर इन किसानों पर पड़ने लगी है। किसान भी बेबस और लाचार अब ऐसे में उन्हें अपने धान की फसल महज 1150 से 1250रूपये क्विंटल बेचना पड़ रहा है। किसानों के हिमायती गांव से लेकर शहर तक नजर नहीं आ रहे हैं। यह तो एक बड़ी सवाल है।लाजमी है जनप्रतिनिधि से लेकर कई सवाल सरकार के सामने सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी है। जिसका जवाब आज भी निरुत्तर है।

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