बसंत भालोटिया
कार्मिक विभाग के प्रधान सचिव से पूछा झारखंड में नि:शक्तता आरक्षण का अनुपालन क्यों नहीं हुआ
झारखंड के अस्तित्व में आने के बाद से ही दिव्यांगजनों को नौकरियों में समुचित आरक्षण नहीं दिया गया है| जिसके कारण उच्च न्यायालय के समक्ष बहुत से मुकदमे दायर हुए हैं। हाल ही में झारखंड उच्च न्यायालय ने रचना कुमारी बनाम राज्य सरकार के केस में बहुत कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अधिकारियों को कानूनी जानकारी का अभाव है। साथ ही राज्य के कार्मिक विभाग के प्रधान सचिव से जवाब तलब करते हुए हाई कोर्ट ने सख्त लहजे में पूछा कि झारखंड में नि:शक्तता आरक्षण का अनुपालन क्यों नहीं हुआ है| जेपीएससी भी इस मामले में कटघरे में खड़ा है। उच्च न्यायालय के कठोर निर्णय की प्रतीक्षा में प्रार्थियों को उम्मीद की किरण दिख रही है। एक अन्य मामले में विभिन्न विश्वविद्यालयों को भी निःशक्तता आरक्षण अनुपालन नहीं करने पर उच्च न्यायालय ने 2020 में नोटिस किया था। कोरोना काल के बाद उस मामले में भी उच्च न्यायालय के कार्यवाही की प्रतीक्षा है। ध्यातव्य है कि जेपीएससी के द्वारा संथाली विषय में नेट जेआरएफ किए हुए दिव्यांग व्यक्ति को साक्षात्कार के लिए नहीं बुलाने पर भी जेपीएससी सहित पूरी प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया है। जेपीएससी ने सहायक प्राध्यापकों के बैकलॉग नियुक्ति में किसी भी तरह के दिव्यांग जनों को आरक्षण का लाभ नहीं दिया तथा वर्तमान में जारी नियमित नियुक्ति प्रक्रिया में भी दृष्टिबाधितों को छोड़कर किसी को भी शामिल नहीं किए जाने पर बहुत सारे मुकदमे उच्च न्यायालय तक पहुंचे हैं। इसके साथ ही झारखंड उच्च न्यायालय का एक स्पष्ट निर्णय यह भी था कि झारखंड में निःशक्तता आरक्षण को लागू करने के लिए रोस्टर को पब्लिक डोमेन में डाला जाए और यदि निशक्तता आरक्षण लागू नहीं हुआ तो सभी संस्थानों के मुखिया इसके जिम्मेदार होंगे। उच्च न्यायालय के इस निर्णय की अवमानना के दोषी अधिकारियों को जवाब देना मुश्किल हो जाएगा। ज्ञात हो कि झारखंड में निःशक्तता आरक्षण को लेकर घोर उदासीनता का रवैया अपनाया जा रहा है तथा अधिकारियों को दिव्यांगजनों के रोस्टर के अनुपालन में भी कानूनी समझ नहीं होने की बात कह कर उच्च न्यायालय ने करारा झटका दिया है




