प्रस्तुति – अनमोल कुमार!
भारतीय संस्कृति में देवी-उपासना की परंपरा अति प्राचीन है। शक्ति की आराधना वेदों से लेकर पुराणों तक उल्लेखित है। नवरात्रि का पर्व इसी शक्ति-पूजा की परिणति है, जिसमें विशेष रूप से माँ दुर्गा की आराधना नौ दिनों तक की जाती है। पूर्वी भारत, विशेषकर पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा और असम में इसका भव्य रूप देखने को मिलता है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव है, जो समाज में ऊर्जा, उत्साह और एकता का संचार करता है। दुर्गा पूजा की शुरुआत विधिवत कलश स्थापना से होती है और इसका समापन विजयादशमी पर माँ दुर्गा की प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ होता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : –
दुर्गा पूजा का उल्लेख देवी महात्म्य, मार्कण्डेय पुराण और कालिका पुराण में मिलता है। कथा के अनुसार जब महिषासुर नामक राक्षस ने तीनों लोकों में अत्याचार शुरू किया, तब देवताओं की सम्मिलित शक्ति से माँ दुर्गा का प्राकट्य हुआ। उन्होंने नौ दिनों तक असुरों से युद्ध किया और दसवें दिन महिषासुर का वध कर धर्म की स्थापना की। तभी से दशहरा अथवा विजयादशमी बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक बन गया।
बंगाल में दुर्गा पूजा का सार्वजनिक स्वरूप 16वीं–17वीं शताब्दी में आरंभ हुआ। पहले यह राजघरानों और ज़मींदारों द्वारा आयोजित की जाती थी। बाद में 20वीं शताब्दी में सार्वजनिक पंडाल संस्कृति का विकास हुआ और आज यह विश्वव्यापी महोत्सव बन चुका है।
दुर्गा पूजा की शुरुआत : कलश स्थापना (महालय और घटस्थापना) : –
- महालय
दुर्गा पूजा का औपचारिक शुभारंभ महालय से माना जाता है, जो पितृपक्ष के समापन और देवीपक्ष के आरंभ का सूचक है। इस दिन प्रातःकाल लोग गंगा-स्नान कर पितरों का तर्पण करते हैं। बंगाल में “महिषासुर मर्दिनी” की मंगलध्वनि गूँजती है। इस अवसर पर यह विश्वास किया जाता है कि देवी दुर्गा कैलाश पर्वत से अपने मायके (पृथ्वी लोक) की यात्रा आरंभ करती हैं।
- कलश स्थापना (घटस्थापना)
नवरात्रि के प्रथम दिन घटस्थापना होती है।
मिट्टी के बर्तन में जौ या गेहूँ के बीज बोए जाते हैं।
उस पर जल से भरा कलश रखा जाता है, जिसमें आम्रपल्लव और नारियल स्थापित किए जाते हैं।
यह कलश देवी दुर्गा का प्रतीक माना जाता है।
घटस्थापना का समय विशेष मुहूर्त में किया जाता है, जिसे शुभ लग्न और प्रातःकाल का समय सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
कलश स्थापना के साथ ही दुर्गा पूजा का आरंभ हो जाता है और अगले नौ दिनों तक विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है।
दुर्गा पूजा : प्रत्येक दिन का महत्व
प्रथम दिन – शैलपुत्री पूजन
नवरात्रि के पहले दिन देवी शैलपुत्री की आराधना होती है। पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती का यह रूप शक्ति, धैर्य और संयम का प्रतीक है। इस दिन लोग व्रत रखते हैं और देवी को श्वेत पुष्प अर्पित करते हैं।
द्वितीय दिन – ब्रह्मचारिणी पूजन
दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। यह साधना, तप और संयम का प्रतीक रूप है। उपासक इस दिन संयम और साधना की प्रतिज्ञा लेते हैं।
तृतीय दिन – चंद्रघंटा पूजन
तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा की आराधना होती है। इनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है। यह रूप शांति और वीरता का प्रतीक है।
चतुर्थ दिन – कूष्मांडा पूजन
चौथे दिन माँ कूष्मांडा की पूजा होती है। इन्हीं के द्वारा ब्रह्मांड की उत्पत्ति मानी जाती है। इस दिन भक्त देवी को मालपुए, मीठे पकवान और कद्दू चढ़ाते हैं।
पंचमी – स्कंदमाता पूजन
पाँचवे दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है। वे कार्तिकेय की माता हैं और करुणा की मूर्ति मानी जाती हैं। बंगाल में पंचमी से ही पंडालों का उद्घाटन होने लगता है और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत होती है।
षष्ठी – कात्यायनी पूजन
षष्ठी के दिन माँ कात्यायनी की आराधना होती है। परंपरा के अनुसार इसी दिन देवी दुर्गा पृथ्वी लोक पर आती हैं। पश्चिम बंगाल में इस दिन “बोधन” की रस्म होती है, जिसमें माँ की प्रतिमा की आँखें बनाई जाती हैं और विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है।
सप्तमी – महाअलंबना
सप्तमी के दिन माँ कालरात्रि की पूजा होती है। बंगाल में सप्तमी की सुबह पंडालों में “नवपत्रिका स्नान” की परंपरा है। इसमें नौ प्रकार के पौधों को देवी का रूप मानकर गंगा स्नान कराया जाता है और प्रतिमा के समीप स्थापित किया जाता है।
अष्टमी – महाअष्टमी
अष्टमी को महाअष्टमी कहा जाता है। इस दिन “कुमारी पूजन” और “महापुष्पांजलि” की रस्म होती है। भक्त पूरी श्रद्धा के साथ “जय माँ दुर्गे” की ध्वनि लगाते हैं। पश्चिम बंगाल में इस दिन धुनुची नृत्य और धाक (ढोल) की गूंज चारों ओर वातावरण को पवित्र कर देती है।
नवमी – महानवमी
नवमी के दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा होती है। यह शक्ति और सिद्धि की देवी हैं। बंगाल और बिहार में इस दिन “हवन” का विशेष महत्व है।
दशमी – विजयादशमी और विसर्जन
दशमी का दिन विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है।
बंगाल में “सिंदूर खेला” की परंपरा है, जिसमें विवाहित महिलाएँ एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं।
इसके बाद माँ दुर्गा की प्रतिमाओं का भव्य जुलूस निकलता है।
“विजया प्रतिमा विसर्जन” गंगा या किसी नदी/तालाब में किया जाता है।
इस दिन बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश मिलता है।
पूजा-विधि और अनुष्ठान :: –
- संधिपूजा – अष्टमी और नवमी के बीच की संधि बेला में की जाती है। इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।
- कुमारी पूजन – छोटी कन्याओं को देवी का रूप मानकर पूजने की परंपरा।
- आरती और ढाक – पंडालों में ढाक की ध्वनि और घंटा-घड़ियाल की गूंज।
- भोग प्रसाद – खिचड़ी, पूड़ी, सब्जी, चटनी, रसगुल्ला और मिष्ठान्न का वितरण।
सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व : –
सामाजिक एकता : दुर्गा पूजा में जाति, वर्ग, धर्म की सीमाएँ टूट जाती हैं।
कला और सृजन : पंडाल निर्माण, मूर्तिकला और सजावट अद्भुत कलात्मकता का प्रदर्शन है।
आर्थिक महत्व : लाखों कारीगर, मूर्तिकार, फूल विक्रेता, कपड़ा व्यापारी, मिठाई दुकानदार – सभी को रोज़गार मिलता है।
सांस्कृतिक उत्सव : नृत्य, संगीत, नाटक, कवि सम्मेलन, मेले आदि से समाज में उमंग का वातावरण बनता है।
आधुनिक युग में दुर्गा पूजा
आज दुर्गा पूजा केवल धार्मिक पर्व नहीं बल्कि वैश्विक सांस्कृतिक उत्सव बन चुकी है। कोलकाता की दुर्गा पूजा को UNESCO ने अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा दिया है। विदेशों में बसे भारतीय भी बड़े पैमाने पर इसका आयोजन करते हैं। आधुनिक पंडालों में थीम-आधारित सजावट, LED लाइटिंग, डिजिटल आरती और पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमाओं की परंपरा विकसित हो रही है।
निष्कर्ष : –
दुर्गा पूजा केवल देवी की आराधना भर नहीं है, बल्कि यह शक्ति, श्रद्धा, कला, संस्कृति और सामाजिक एकता का अद्वितीय संगम है। इसकी शुरुआत महालय और कलश स्थापना से होकर नौ दिनों की साधना, उत्सव और भक्ति में बदल जाती है। विजयादशमी पर माँ दुर्गा की विदाई हमें यह संदेश देती है कि सत्य की सदैव विजय होती है।




