✍️पंकज का पंच!

मनरेगा योजना आधी हकीकत, आधा फसाना!
कागजों पर दिख रहा है काम धरातल पर फिसड्डी!
हम तो बोलेंगे हुजूर
सरकारी योजना में मनरेगा योजना क्या कहने इस योजना के इस योजना के तहत मिट्टी खुदाई से लेकर पीसीसी वर्क किया गया।
लेकिन सिर्फ कागजों पर धरातल पर नहीं। दरअसल जिले मैं मनरेगा के नाम पर लूट मची हुई है तो, वार्ड से लेकर मुखिया जी रातों-रात धनकुबेर बन रहे हैं। कहते हैं इस योजना में जब किसी के गर्दन पर फांस आती है। तो सरकारी बाबू से लेकर मुखिया जी तक की पकड़ राजनीतिआकाओं तक होती है।
और जब इर्द-गिर्द बाबू से लेकर मुखिया जी तक गर्दन फंसने लगती है। तो यह राजनीतिक आका आगे आकर रात के अंधेरे में दस्तक देते हैं। और सुबह होने से पहले अपने चेहरे को बेदाग कर निकल जाते हैं। कहते हैं इसके लिए हर प्रखंड में बिचौलिए का एक बड़ा नेटवर्क होता है। जहां हर काम पर कमीशन बना होता है। जबकि नाम ना छापने की शर्त पर कई मजदूर बताते हैं कि जो मनरेगा के मजदूर नहीं भी हैं। वैसे प्रवासी को ढूंढ ढूंढ कर सरकारी महकमे की मदद से जॉब कार्ड बनाया गया। वैसे भी 17 दिन की मजदूरी भेजी गई तो कहीं 15 दिन की कहीं 8 दिन की इनके खाते में पैसे आने के बावजूद इनकी मजबूरी देखिए यह पैसा निकालकर सीधे जनप्रतिनिधि या बिचौलियों को दे देते हैं। और इन्हें मिठाई खाने के नाम पर 200 से ₹300 दिया जाता है। अब ऐसे में यह बेरोजगार भी खुश चलो बैठे बिठाए 200 से 300 आ गए।
लेकिन उन बाबुओं का क्या जो सरकारी ऑफिस में कुंडली मारकर बैठे हुए हैं। और कुंभकरण निंद्रा में दनादन फाइल बाबू बना रहे हैं। सवाल उठता है अब जब योजना को धरातल पर जाकर देखने की बात है। उसके बाद कोई भी सरकारी राशि प्राकलित जाएगी, तो सवाल उठता है कि उन बाबुओं से क्यों नहीं आज तक पूछा गया कि आखिर विकास का चक्का इतने के बावजूद क्यों अटका है।
ऐसे ही योजना आपको मनरेगा में मिल जाएगी पशु के लिए शेड बनाने वाली योजना, इस योजना के तहत प्राकलित राशि में भी लगभग 90% लोगों को आज तक पूरी राशि नहीं मिल पाया। कहीं राशि भेंट बाबू की तो कहीं बिचौलिए की, ऐसे ही मनरेगा के तहत योजना है वृक्षारोपण जहां कागजों पर हजारों पेड़ लगाए गए लेकिन आप धरातल पर जाकर देखेंगे तो आपकी पांव तले जमीन खिसक जाएगी।
अब हमारे अधिकारियों को चाहिए कि ऐसे योजनाओं को आगे आकर जांच करें और भ्रष्टाचारियों पर कड़ा प्रहार करें जिससे आम जनमानस के बीच प्रशासनिक महकमे की प्रतिष्ठा बरकरार रहे। हालांकि कहते हैं राजनीति में जब महत्वाकांक्षाओं के बर्तन खतकते हैं। तो हलचल और दस्तक पंचायत के कोने से लेकर आम जनमानस तक पहुंचता है। हम खाना लेंगे सरकारी योजनाओं में से उन योजनाओं को, जो 5 साल के बाद भी धरातल पर आम जनमानस के लिए नहीं आ पाया, सवाल इसीलिए जनता के 5 साल पथराई आंखों का सवाल है, हम तो बोलेंगे हुजूर।




