छठ महापर्व 2020:क्यों मनाई जाती है छठ पूजा? जानिए 4 दिन के इस त्योहार से जुड़ी मान्यता!

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छठ महापर्व 2020:क्यों मनाई जाती है छठ पूजा? जानिए 4 दिन के इस त्योहार से जुड़ी मान्यता


पंकज कुमार ठाकुर के साथ अनूप कुमार

बिहार (बांका)! इस साल छठ पूजा का महापर्व 20 नवंबर को है. कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से शुरू होकर यानि 18 नवंबर से 20 नवंबर तक छठ का महापर्व मनाया जाता है. नहाय खाय के साथ शुरू होने वाले इस पर्व में सूर्य भगवान की विशेष उपासना की जाती है. इसमें उगते और डूबते सूर्य की पूजा की जाती है. छठ का व्रत काफी कठिन और नियम के साथ किया जाता है. इस बार छठ पूजा की शुरुआत रवियोग से हो रही है. नहाय खाय रवियोग में हो रहा है. इसके साथ ही सूर्य भगवान को अर्घ्य द्विपुष्कर योग में दिया जाएगा. छठ पूजा के लिए कुछ चीजों की जरूरत पड़ती है. प्रसाद रखने के लिए बांस की दो तीन बड़ी टोकरी, बांस या पीतल के बने तीन सूप, लोटा, थाली, दूध और जल के लिए ग्लास, नए वस्त्र साड़ी-कुर्ता पजामा, चावल, लाल सिंदूर, धूप और बड़ा दीपक, पानी वाला नारियल, गन्ना जिसमें पत्ता लगा हो, सुथनी और शकरकंदी, हल्दी और अदरक का पौधा, नाशपाती और बड़ा वाला मीठा नींबू, जिसे टाब भी कहते हैं, शहद की डिब्बी, पान और साबुत सुपारी, कैराव, कपूर, कुमकुम, चन्दन, और कई तरह की मिठाई. छठ पूजा में ठेकुआ का बहुत महत्व होता है. ठेकुआ ज्‍यादातर बिहार और झारखंड के लोग बनाते और खाते हैं. ठेकुआ को छठ पूजा के मौके पर विशेष रूप से तैयार किया जाता हैं. तो चलिए आज हम आपको बताते हैं ठेकुआ बनाने के कुछ नियम.
पूजा के 4 दिनों का महत्व
चार दिनों के इस पर्व में 36 घंटों का उपवास भी रखा जाता है। चलिए आपको चारों दिनों के महत्व के बारे में बताते हैं।

पहला दिन : नहाय खाय
पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को नहाय खाय के रुप में मनाया जाता है। इस वर्ष नहाय खाय 31 अक्टूबर दिन वीरवार को सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र बनाए। इसके बाद छठ व्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन को ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करें। घर के बाकी सदस्य व्रती के भोजन के उपरांत ही भोजन करें। भोजन के रुप में कद्दू, दाल व चावल को ग्रहण कर सकते है। दाल में चने की दाल को शामिल करें।
दूसरा दिन: खरना व लोहंडा
दूसरे दिन कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखें व शाम को भोजन करें। इसे खरना कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए आसपास के सभी लोगों को आमांत्रित करें। प्रसाद के रुप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध चावल का पिट्ठा और घी से चुपड़ी रोटी बनाएं। इसमें नमक या चीनी का प्रयोग न करें।

तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य
तीसरे दिन घर पर छठ प्रसाद बनाएं जिसमें ठेकुआ और कसार के साथ अन्य कोई भी पकवान बना सकते है। यह पकवान खुद व्रत करने वाले या उनके घर के सदस्यों मिलकर बनाएं। छठ के लिए इस्तेमाल होने वाले बर्तन बांस या मिट्टी के होने चाहिए। शाम को पूरी तैयारी के साथ बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाएं। वर्ती के साथ परिवार के सारे लोग सूर्य को अर्घ्य देने के लिए घाट पर जाएं।

चौथा दिन: सुबह का अर्घ्य
चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उगते हुए सूर्य की अर्घ्य दें। वर्ती प्रात सुबह पूजा की सारी साम्रगी लेकर घाट पर जाएं और पानी में खड़े होकर सूर्य भगवान के निकलने का पूरा श्रद्धा से इंतजार करें। सूर्य उदय होने पर छठ मैया के जयकारे लगाकर सूर्य को अर्घ्य दें। आखिर में व्रती कच्चे दूध का शर्बत पीकर और प्रसाद खा कर अपना व्रत पूरा करें।
छठ पूजा से जुड़ी मान्यता व पूजन विधि
हिंदी पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्य भगवान स्वास्थय संबंधी कई समस्याओं को ठीक करते हैं और साथ ही सुख समृद्धि भी देते हैं। लोग सूर्य देवता से स्वास्थय व समृद्धि के लिए कठिन व्रत व पूजन करते हैं।
इसमें व्रत, नदी के पावन जल में नहाना, सूर्योदय पर पूजा और सूर्यास्त पर पूजा और साथ ही सूर्य को जल चढ़ाना शामिल होता है।
छठ पर्व से जुड़ी प्रचलित ऐतिहासिक कहानियां
छठ पर्व कैसे शुरू हुआ इसके पीछे कई ऐतिहासिक कहानियां प्रचलित हैं। पुराण में छठ पूजा के पीछे की कहानी राजा प्रियंवद को लेकर है। कहते हैं राजा प्रियंवद को कोई संतान नहीं थी तब महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियंवद की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन वो पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ। प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं और उन्होंने राजा से कहा कि क्योंकि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं, इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं। उन्होंने राजा को उनकी पूजा करने और दूसरों को पूजा के लिए प्रेरित करने को कहा।

राजा प्रियंवद ने पुत्र इच्छा के कारण देवी षष्ठी की व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। कहते हैं ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी और तभी से छठ पूजा होती है। इस कथा के अलावा एक कथा राम-सीता जी से भी जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब राम-सीता 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे तो रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए उन्होंने ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूर्य यज्ञ करने का फैसला लिया। पूजा के लिए उन्होंने मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया । मुग्दल ऋषि ने मां सीता पर गंगा जल छिड़क कर पवित्र किया और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। जिसे सीता जी ने मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।

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