दिवाली के बावजूद कुम्हारों की दिवाली फीकी!

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आशुतोष पांडेय की रिपोर्ट

आरा के कुम्हारों की दिवाली पिछ्ले कुछ सालों से काफी मन्दी हो गई है। जगमगाते इलेक्ट्रिक झालरों ने इनकी मेहनत में मन्दी का दौर ला दिया है। इस बीच लोगों के अन्दर मिट्टी के दिये की जगहों पर इलेक्ट्रिक लाईटो ने जगह बना ली है जिसकी वजह से कुम्हारों को अपनी रोजगारी में काफी मशक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। आरा के मौलाबाग स्थित एक कुम्हार का मानना है कि हम गरीब लोग कुम्हारी से इतना नहीं कमा पाते हैं कि अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे पाए  । हमारे बच्चे अधिक समय तो हमारी मदद करने में ही देते हैं ताकि घर परिवार अच्छे से चल सके।  इन पांच- छ: सालों में मिट्टी के दीए की खरीद बिक्री काफी कम हो गई है हम लोग ज्यादातर आश्रित रहते हैं पूजा पाठ में उपयोग होने वाले दीये से । यह इलेक्ट्रॉनिक लाइटो ने मिट्टी के दीए को और साथ ही साथ हमारे व्यवसाय को भी काफी प्रभावित किया है । तो वही दूसरे कुम्हारों का मानना है कि इस साल भी मिट्टी के दीयों की बिक्री शायद कम हो।  यहां के कुम्हारों की सबसे बड़ी परेशानी यह आ रही है कि दूर दूर तक कहीं पर भी अब मिट्टी सही से उपलब्ध नहीं हो पा रही है । जिसकी  वज़ह से इन्हें मिट्टी काफी ज्यादा दरों में खरीदनी पड़ती है।हालांकि।दीपावली को ले दिन रात एक कर ये कुम्हार जीतोड़ मेहनत करते हैं ताकि एक मोटी रकम कमा कर अपनी जीविका चला सके।उम्मीद करते हैं ये कुम्हार की इस दिपावली उनके घर भी ग्राहक रौशनी फैलाएंगे।
 बाईट/-कुम्हार 

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