शंकर दयाल मिश्रा के साथ पंकज कुमार ठाकुर!
समस्तीपुर सर्किट हाउस से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवानी को गिरफ्तार कर मसानजोर गेस्ट हाउस भेज दिया गया है। इसी के साथ पिछले 27 दिनों से चल रही भाजपा की रथ यात्रा पर विराम लग गया… मणिकांत ठाकुर, बीबीसी पटना।
समस्तीपुर के तत्कालीन डीएम आरके सिंह (आरा से फिलहाल भाजपा सांसद और केंद्रीय मंत्री) और डीआइजी रामेश्वर उरांव (झारखंड के वर्तमान वित्तमंत्री) ने मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के इस सीक्रेट मिशन को अमली जामा पहनाया था। तकरीबन डेढ़ लाख कारसेवक एहतियातन गिरफ्तार के लिए गए थे। केंद्र सरकार से भाजपा समर्थन वापसी की तैयारी में लग चुकी थी।
एक घटना का जिक्र यहां जरूरी है। हालांकि यह बिहार में हुई नहीं थी, किन्तु कालांतर में बिहार की राजनीति पर इसका महत्वपूर्ण असर हुआ। इसी बीच 30 अक्टूबर का दिन आ जाता है। तय समय पर कारसेवा शुरू होती है। अयोध्या में तत्कालीन मुलायम सिंह के नेतृत्व की सरकार ने गोली चलाने का आदेश दिया और छह कारसेवक मारे गए। इसी के साथ भाजपा ने केंद्र सरकार से समर्थन वापस ले लिया और फिर प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिर गई। इसके बाद चंद्रशेखर के नेतृत्व में एक सरकार 10 नवंबर 1990 को गठित हुई जिसका पतन शीघ्र (6 मार्च 1991 को) हुआ। 1991 में ही लोकसभा के मध्यावधि चुनाव घोषित हुए।
दिसंबर 1989 में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार बनने और साल 1991 में मध्यावधि चुनाव की घोषणा तक देश में जबरदस्त राजनीतिक उथल-पुथल रहा। यह अब जन मानस के बीच वोटों की लड़ाई के रूप में जा चुका था। राष्ट्रीय मोर्चा और जनता दल बिखरने लगा। मुलायम समाजवादी जनता पार्टी का रूप ले चुके थे। बीजू पटनायक के बाद जनता दल की राजनीति का पूरा दारोमदार लालू प्रसाद पर था। लालू ने चुनाव पूरे मेहनत से लड़ा। उसी दौरान राजीव गांधी की श्रीपेरम्बदूर में हत्या हो गई। उनके अंतिम संस्कार के राष्ट्रीय टीवी पर हुए सजीव प्रसारण से संवेदना की लहर पर कांग्रेस सवार हो गई थी। इस राष्ट्रीय असर के बावजूद लालू प्रसाद ने बिहार में सिर्फ एक बेगूसराय सीट पर रोक दिया। इस चुनाव से पूर्व राम रथ पर सवार हो चुकी भाजपा को भी नौ सीटों से उतारकर पांच सीट पर ला दिया। तब लालू की अगुआई वाली जनता दल ने अपने कुनबे के साथ बिहार की 54 में से 45 सीटें जीती।
बहरहाल, इस चुनाव के बाद जनता दल में लालू का कद काफी बड़ा हो चुका था। बिहार में एक नया सामाजिक समीकरण बन चुका था। लालू को ‘सामाजिक न्याय का मसीहाÓ कहा जाने लगा। लालू प्रसाद यादव अब ब्रांड बन चुके थे। इसके बाद उन्होंने उनको राजनीतिक पहचान देने वाले शरद यादव मधेपुरा की सीट पर जनता दल के चक्र निशान के उतार दिया। रोम पोप का और मधेपुरा गोप का कहावत को झुठलाने के लिए महिषी के जनतादल के ही विधायक आनंद मोहन ने शरद यादव को चुनौती दे डाली। उस चुनाव में सिंहेश्वर के विधायक और कोशी में बाहुबल के पर्याय पप्पू यादव (आज के जनाधिकार पार्टी के नेता) के लोगों की मदद शरद यादव को भारी जीत मिली। मधेपुरा एकाएक देश के राजनीतिक नक्शे पर आ गया था।
मधेपुरा उपचुनाव के बाद से बिहार की राजनीति में लालू और मजबूत हुए!
(अगले अंक में जानेंगे समता रमता हुआ और बीपीपा पी पा कर कैसे सो गया)
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कार्यकारी संपादक पंकज कुमार ठाकुर




