:- संपादकीय आलेख (रवि शंकर शर्मा)
जिस दल ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को छोड़ कर संप्रदायवाद, समुदायवाद और जातिवाद को अपना लिया, पंडित दिन दयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, के सिद्यांतों को तिलांजलि दे दी, अटल आडवाणी के विचारों को दरकिनार कर, मोदी शाह की जोड़ी को ही “विचार और पार्टी” समझ लिया हो ,जिस दल ने ‘एक देश ,एक विधान, एक निशान और एक प्रधान“ के नारे से मुंह फेर लिया हो, और उसके बदले एक देश अनेक विधान (सवर्ण के लिए अलग, ओबीसी के लिए अलग ,SC/ST के लिए अलग क़ानून,अलग धर्म के लिये अलग क़ानून ) स्थापित किया और सर्वोच्च न्यायलय के आदेश को अध्यादेश लाकर पलट दिया हो, यहाँ तक की स्कूलों कॉलेज के बच्चों को UGC जैसे काले क़ानून लाकर जातिवाद की जहर पिलाने की कोशिश की हो,जबकी हमारे ज़माने के स्कूली मित्र जो दलित भी हैँ पिछड़े और अति पिछड़े भी हैँ, अलग अलग धर्मो के भी हैँ, जो आज भी मिलें तो एक थाली मे ही खाना पसंद करते हैँ , उसे बाँटने का प्रयास करने वाली पार्टी का पतन कैसे ना हो? जो कार्यकर्त्ताओं की घोर उपेक्षा करे और नैतिकता के नाम पर उसका कोई जायज काम तक ना करे उसका पतन कैसे ना हो?
हम जेन जी और जेन अल्फ़ा नहीं हैँ, हमारा जेरेशन आपके हर तिकरम को समझता है, हमने असल भाजपा को देखा है !
ये श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दिन दयाल उपाध्याय और अटल आडवाणी की भाजपा नहीं रही ये तो मोदी शाह की भाजपा है, जो जाति देखकर, समाज को बाँट कर राजनीति कर रही है,जिसका पतन तय है!… और दोषी संघ भी है, जो सबकुछ चुपचाप देख रही है, हिन्दुओं को एक करने के सपने और सिद्यांत को गुरु गोलवलकर और हेडगेवार के विचारों पर परम् आदरणीय मोहन भागवत जी के नेतृत्व वाली संघ ने UGC पर मुंह बंद कर एक झटके मे पानी फेर दिया,और आज ज़ब हार मिली, भाजपा के खिलाफ लोग उठ खड़े होने लगे तब आदरणीय मोहन भागवत जी आगे आये उन्होंने तुरंत भाँप लिया कि क्या चल रहा है, उन्होने आंदोलन कारी जेन जी को देशभक्त कहा, जेन अल्फ़ा को भविष्य बताया, क्यूँ? पहले सरकार को समझा नहीं सकते थे?धर्मेंद्र प्रधान का इस्तिफा पहले नहीं हो सकता था?
और दतिया हो या बाँकीपुर उपचुनाव हारने के बाद भी जिस दल को ये नहीं समझ आ रहा है की उसका कोर वोटर (सवर्णो) का विश्वास मोदी और शाह वाली भाजपा से तेजी से ना सिर्फ खिसक रहा है बल्कि दूसरी ओर शिफ्ट भी हो रहा है,उसका पतन कैसे ना हो?
आप अपनी उपलब्धि बतायें विपक्ष की खामी गिनाने के लिये आपको सत्ता नहीं मिली है! विपक्ष ने गलती की इसीलिए आपको गद्दी मिली थी,एक युग बीत चुके, देश कबतक इंतजार करे? नेहरू जी ने जमीने गंवा दी, आप तो रोज नए नये हथियार बना रहे हैँ, मिसाइलें प्रक्षेपित कर रहे हैँ, क्या आजाद कश्मीर हमें वापस मिल गया? या अक्साई चीन आपने छीन ली? हिंदूवादी पार्टी की वकालत करने वाले बतायेंगे की कबतक कैलाश मानसरोवर फिर हमारा होगा? कब हम बेरोक टोक बगैर बीजा पासपोर्ट महादेव के दर्शन को जा पाएंगे? कोई जबाब नहीं!
दो दशक से बिहार की सत्ता में रहकर भी क्या ये जबाब है आपके पास की बिहारी लोग आज भी मजदूरी करने बाहर क्यूँ जा रहे हैँ? (मैंने नौकड़ी करने जाने वालों की बात नहीं की है) अगर ये सुशासन है फिर तो फिर मनोनुकूल और जरूरत अनुसार निवेश क्यूँ नहीं आ सका ? उद्योग इतने क्यूँ नहीं लगे की कोई बिहारी बाहर ना जाये परिवार छोड़कर मजदूर बनने , उसे अन्य प्रदेशों में जिल्ल्त ना उठानी पड़े? कोई जबाब नहीं! हाँ आपने किया क्या? तो हार पर मंथन ! और उस मंथन मे क्या किया ? क्या निकला ? तो छात्र आंदोलन ,भरत तिवारी एनकाउंटर? अपनी बातों को जनता के बीच ना समझा पाना?
लेकिन हार पर हुए मंथन मे इस घोर गंभीर विषय को उठाया तक नहीं गया, की आपके कोर वोटर (सवर्णो) समेत अन्य जातियों का विश्वास बहुत तेजी से आपसे टूट रहा है और विकल्प तलाश रहा है, मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग सिसक सिसक कर, घूंट घूंट कर जी रहा है,पर क्या कभी आपने सोंचा इस बारे में?
उल्टे हार के अलग अलग कारण गिनाये गए, कार्यकर्ताओ को सोशल मीडिया पर काउंटर जबाब देने के निर्देश दिए गए! अब भला आप बताएँ इस घनघोर जातिवादी, समुदायवादी, संप्रदायवादी पार्टी का बंटाधार होने से क्या अब प्रभु राम भी इसे बचा सकते हैँ? वक्त है… सुधार कर सकते हैँ तो कर लें! इतिहास गवाह है जिस जिस ने अपने मूल को छोड़ा वो कहीं का ना रहा!
अगर आपको हमारी बातों पर भरोसा ना हो तो या तो आँख बंद किये हैँ या सच कि ओर देखने तक से डरते हैँ! चलिए एक उदाहरण देते हैँ , माननीय प्रधानमंत्री जी ने देश की जनता को कभी स्वतः लॉक डाउन के लिये कहा था, कभी ताली तो कभी थाली बजवाई थी, कभी मोबाइल का फ़्लैश लाइट जलवाया था, इन सबमे पूरा देश जाति धर्म समुदाय यहाँ तक की पार्टी से ऊपर उठकर आप पर भरोसा किया और आपने जैसा कहा उसे “देववाणी” समझकर माना, हाँ या ना? माना था ना? प्रधानमंत्री जी आज वैसा ही कर के दिखा सकते हैँ? क्या ये देश अब भी आपकी बात उसी प्रकार सुनेगा? चाहें तो आजमा लीजये! और अंत में देश के आम लोग धन के लिये तरस रहे हैँ, जो “मन की बात” थोपने से नहीं होगा! आपने कार्यकर्त्ताओं को कॉर्पोरेट का कर्मचारी बना दिया है, मन की बात सुनी गई तो उसका सरल एप पर फोटो अपलोड करना अनिवार्य है? क्यूँ? आपमें श्रद्धा है विश्वास है तो खुद सुनेंगे कार्यकर्त्ता, खुद सुनेगी जनता, मजबूर क्यूँ किया जा रहा है, सुबूत क्यूँ चाहिए आपको?
नोट :- ये भाजपा के बारे में मेरी व्यक्तिगत राय है, आप सप्रेम सहमत और असहमत हो सकते हैँ, यही लोकतंत्र है!



