रिपोर्ट :- संतोष चौहान
श्रावण की प्रथम सोमवारी से शुरू होगा 13 दिवसीय व्रत, नाग पंचमी, मोना पंचमी और मनसा देवी पूजन का दुर्लभ संयोग
सुपौल :- मिथिला की सांस्कृतिक परंपराओं में विशेष स्थान रखने वाला अखंड सौभाग्य का लोकपर्व मधुश्रावणी इस वर्ष 3 अगस्त (सोमवार) से आरंभ होगा। विशेष बात यह है कि इस बार यह पर्व अमृत योग में प्रारंभ हो रहा है। इसी दिन श्रावण मास की प्रथम सोमवारी, नाग पंचमी, मोना पंचमी तथा मनसा देवी पूजन का दुर्लभ संयोग भी बन रहा है, जिससे इस पर्व का धार्मिक महत्व और बढ़ गया है।
त्रिलोकधाम गोसपुर निवासी पंडित आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने बताया कि मिथिला में सावन के आगमन के साथ ही लोक आस्था और संस्कृति से जुड़े अनेक पर्व-त्योहारों की शुरुआत हो जाती है। इनमें मधुश्रावणी नवविवाहिताओं का सबसे महत्वपूर्ण लोकपर्व माना जाता है। यह व्रत नवविवाहित महिलाएं अपने पति के दीर्घायु, अखंड सौभाग्य, सुखी दांपत्य जीवन तथा गृहस्थ जीवन में मान-सम्मान और मर्यादा की रक्षा के लिए अत्यंत श्रद्धा एवं उल्लास के साथ करती हैं।
आचार्य मिश्र ने बताया कि वैदिक काल से मिथिला में यह मान्यता रही है कि पवित्र श्रावण मास में नाग देवता की श्रद्धापूर्वक पूजा करने से दंपति का वैवाहिक जीवन सुखमय एवं दीर्घायु होता है तथा परिवार पर आने वाले संकट दूर होते हैं। इस पर्व में भगवान शिव-पार्वती के साथ-साथ विषहरी माता, मनसा देवी तथा नाग-नागिन की भी पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि नाग देवता की आराधना से काल भय एवं वास्तु दोष का निवारण होता है।
उन्होंने बताया कि 13 दिनों तक चलने वाला मधुश्रावणी व्रत इस वर्ष 3 अगस्त से प्रारंभ होकर 15 अगस्त (शनिवार) को टेमी दागने की पारंपरिक रस्म के साथ संपन्न होगा। अंतिम दिन महिलाओं द्वारा स्वर्ण गौरी व्रत भी किया जाएगा।
मधुश्रावणी की एक विशेष परंपरा यह भी है कि नवविवाहिताएं इस अवधि में ससुराल से भेजे गए वस्त्र, आभूषण और पूजन सामग्री का ही उपयोग करती हैं। व्रत के प्रथम और अंतिम दिन विशेष विधि-विधान से पूजा संपन्न होती है। पूजा के उपरांत अनुभवी एवं विदुषी महिलाएं मधुश्रावणी व्रत कथा सुनाती हैं, जिसमें भगवान शिव और माता पार्वती के दांपत्य जीवन के प्रसंगों के माध्यम से प्रेम, विश्वास, रूठना-मनाना, धैर्य और पारिवारिक जीवन के आदर्शों का संदेश दिया जाता है, ताकि नवविवाहिताएं वैवाहिक जीवन की हर परिस्थिति में संयम और समझदारी के साथ सुख-शांति से जीवन व्यतीत कर सकें।
व्रत के समापन पर नवविवाहिता सभी सुहागिन महिलाओं को अपने हाथों से खीर का प्रसाद वितरित करती हैं तथा मेहंदी लगाती हैं। अंतिम दिन पारंपरिक रीति से चार स्थानों पर टेमी दागने की रस्म निभाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह संस्कार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चार पुरुषार्थों की प्राप्ति तथा अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।



