रमजान महीने का आखरी अलविदा जुम्मे की नमाज की गई अदा!

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रिपोर्टर — राजीव कुमार झा!

मधुबनी जिले के सभी सहर से लेकर गांवों तक रमजान महीने की आखरी जुम्मा जिसे अलविदा जुमा भी कहते है , जुमा की नमाज से पहले तकरीर किया गया। इस दौरान तकरीर करते हुए बाटा चौक जामा मस्जिद मधुबनी के इमाम शहजाद ने बताया कि
आज रमजानुल मुबारक का 25 वा रोजा है। इस मौके से आप सल्लल्लाहू अलाइहे वसल्लम ने फरमाया जब माहे रमजान की पहली रात आती है तो शैतान और सरकश जिन जकड़ दिए जाते है। जहन्नम के दरवाजे बंद करदिए जाते है। और जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते है। पुकारने वाला पुकारता है खैर के चाहने वाले आगे बढ़ और बुरा चाहने वाले रुक जा और रमजान के हर रात बंदे को जहन्नम से आजाद कर के जन्नत के अंदर दाखिल करता है।
यह महीना सब्र का महीना है। सब्र का बदला अल्लाह जन्नत अता फरमाता है। उन्होंने बताया कि रमजान के महीने का रोजा रखना उन के लिए फायदेमंद है, जो रोजे के हालात में बुराइयों से बचे यह नहीं कि रोजा हम रख लिए दिनभर भूखे हैं। दिन भर बुराइयां सुनते हैं, बुराइयां देखते हैं, बुराइयां बोलते हैं। ऐसे रोजेदार बंदों की अल्लाह को जरुरत नहीं है। उन्होंने कहा कि अल्लाह को ऐसे बंदे की जरूरत है जो रोजे के साथ-साथ पूरी तरह से इस्लाम पर अमल करें किसी भी तरह का वह गुनाह नहीं करें ना गलत देखे ना गलत सुने ना गलत बोले ऐसे रोजदार को अल्लाह पूरा के पूरा सवाब देंगे। ऐसे बंदे को जन्नत में दाखिल करेंगे। उन्होंने बताया कि एक महीने का हम रोजा रख लेते हैं इसका यह मतलब नहीं कि हम 11 महीने वैसे खोलेंआम रहे। एक महीने के रोजा से हमें अपने पूरे जिंदगी में उसी तरह अम्ल करना है। जिस तरह एक महीना रोजे के हालात में अम्ल करते हैं।
कुरान के दूसरे पारे के आयत नंबर 183 में लिखा है रोजा रखना हर मुसलमान के लिए जरूरी बताया गया है। रोजा सिर्फ भूखे, प्यासे रहने का नाम नहीं बल्कि खुद पर नियंत्रण करना, अश्लील या गलत काम से बचना है। इसका मतलब हमें हमारे शारीरिक और मानसिक दोनों के कामों को नियंत्रण में रखना है।
इस मुबारक महीने में किसी तरह के झगड़े या गुस्से से ना सिर्फ मना फरमाया गया है। बल्कि किसी से गिला शिकवा है तो उससे माफी मांग कर समाज में एकता कायम करने की सलाह दी गई है। इसके साथ एक तय रकम या सामान गरीबों में बांटने की हिदायत है। जो समाज के गरीब लोगों के लिए बहुत ही मददगार है।

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