✍️ पंकज का पंच!

हम तो बोलेंगे हुजूर!
कहां तो तय था चिराग हर घर के लिए, यहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए!
चुनाव यानी नेताजी का आसमान से जमीन पर कदम पड़ने का वक्त। चुनाव यानी फिर एक बार जनता की आंखों में धूल झोंकने की बारी। बिहार में इस समय वही वक्त शुरू हो रहा है। 5 साल बीत गए। धूल छटता है 5 साल बाद जब जनता नेताजी मिलन ग्रामीण के बीच नेताजी आज अचानक धरातल पकड़ चुके हैं। जबरदस्त मंच सज रहा है तो दावों और वादों की ताबड़तोड़ बम बाजी भी हो रही है। नेताओं की राशन वाली खुराक जनता की भीड़ से अनुमान लगाया जा रहा है। लिहाजा जनता के सामने अब एक नया वादा किया जाता है।
तालियां बजती है । मुखिया जी प्रफुल्लित होकर कन्नी काट कर निकल लेते हैं। जनता से चुनाव में हुआ वादा भी मुखिया जी की गाड़ी से उठे धूल से उड़े धूल में ढक जाती है। सवाल इसलिए 5 साल इंतजार करते मतदाता की उम्मीद क्या धूल में गुम हो जाती है? इसी को लेकर प्रथम चरण में होने वाले पंचायत चुनाव को लेकर पक्ष हो या विपक्ष जनाक्रोश लगभग दोनों पर दिख रहा है। दरअसल लोग बाग को कोरोना काल खंड में निचले स्तर से लेकर झूठ भैया नेताजी से लेकर मंत्री जी तक आइसोलेट रहे, ऐसे में मुखिया जी के सर मुंडवाते ही ओले पड़ने की बरसात शुरू हो चुकी है। दरअसल अब जनता भी मुखिया से सीधे सवाल और जवाब कर रहे हैं।
हम तो बोलेंगे हुजूर।




