आरा में धूमधाम से मनाई जा रही बाबू वीर कुंवर सिंह जयंती!

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आरा/आशुतोष पाण्डेय

आरा/बाबू वीर कुंवर सिंह के बारे में आज देश का बच्चा-बच्चा जानता है. हर घर में उनकी बहादुरी की कहानी बताई जाती है. कैसे उन्होंने 80 साल की उम्र में अंग्रेजों को धूल चटाई थी.

जिला प्रशासन ने धूमधाम से मनाई, जयंति

जिला प्रशासन ने बाबू वीर कुँअर सिंह की जयंती के अवसर पर रविवार की सुबह प्रभारीफेरी निकाली गई, जो शहर के महत्वपूर्ण जगहों से घूमते हुए, वीर कुँअर सिंह पार्क में समाप्त हुआ, इसके बाद जिलाधिकारी राजकुमार पुलिस अधीक्षक प्रमोद कुमार यादव समेत अन्य पदाधिकारियों ने 18 सो 57 का महान योद्धा बाबू वीर कुंवर सिंह के प्रतिमा पर माल्यार्पण किया,जहाँ शहर के गणमान्य लोगों के साथ-साथ उस स्कूल के बच्चे भी शामिल थे

अंग्रेजी सेना से निर्णायक लड़ाइयां लड़ीं 
1857 के स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा वीर कुंवर सिंह का जन्म 13 नवंबर 1777 को बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर गांव में हुआ था. इनके पिता का नाम बाबू साहबजादा सिंह था. वह प्रसिद्ध शासक भोज के वंशजों में से थे. कुंवर सिंह 1857 की क्रांति के ऐसे नायक थे. जिन्होंने अपनी छोटी-सी रियासत की सेना के दम पर आरा से लेकर रोहतास, कानपुर, लखनऊ, रीवां, बांदा और आजमगढ़ तक में अंग्रेजी सेना से निर्णायक लड़ाइयां लड़ीं और कई जगहों पर जीत हासिल की. 

युद्ध का किया ऐलान

विद्रोह को शांत करने के लिए पटना के तत्कालीन कमिश्नर टेलर ने 18 जून 1857 को बिहार के जमींदारों और राजाओं की एक बैठक बुलाई. लेकिन अंग्रेजों के आमंत्रण को सिरे से ठुकराते हुए उनके खिलाफ युद्द का ऐलान करने वाले बिहार के जगदीशपुर के सपूत बाबू वीर कुंवर सिंह 1857 की स्वतंत्रता क्रांति के पहले महानायक बने. बाबू कुंवर सिह छापामार युद्ध में निपुण थे. 

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