अनुपम लाड़
शहर में कोहरा बढ़ता जा रहा है कुछ दिखाई नहीं दे रहा, पर शायद अब प्रजा को उसके भीतर छुपे अराजक तत्व ज़रूर दिख रहे है। जिस तरह पिछले कुछ सालो में लगातार सरकार सियासी कटघरों में खड़ी होती नज़र आ रही है, उससे यह तो साफ़ पता लगता है की इस प्रजा के मन में अब उनकी चुनी सत्ता पर आक्रोश का बुलबुला फुट रहा है। इस आक्रोश की कई वजह है, आम इंसान की दिक्कत ख़त्म न करते हुए उसे अपने ही ढोंग में लिपटकर व्यक्ति को ख़ामोशी से अपनी तरफ कर देना हो या उनकी वास्तविक परेशानी को नज़रंदाज़ करना हो। पिछले कुछ दिनों से यही आक्रोश, यही गुस्सा, और कुछ न कर पाने की यही निराशा मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय के बच्चो में देखने को मिल रही है। लम्बे समय से चल रहे इस टग ऑफ़ वॉर में यह बात तो साफ़ हो गई है की जिसके पास सत्ता का सुख, पैसा और ताकत है, इस देश में वो कुछ भी कर सकता है। मुद्दा सिर्फ ऑनलाइन या ऑफलाइन एग्जाम तक नहीं है। अगर इस विषय में वाकई में गौर किया जाए तो यह मुद्दा जीवन के साथ खिलवाड़ करने का आने वाले दौर के लिए सबसे बड़ा उदाहरण बनने जा रहा है। विश्वविद्यालय और सरकार की यह ज़िद न जाने कितनो की बलि दे रही होगी, यह ज़िद न जाने कितनो के आंसू सुखाने वाली है, शायद ऐसा भी हो की यही ज़िद कुलपति महोदया की रातों की नींद भी उड़ा, क्योंकि जब सपनों में बेबस और लाचारी से चूर चेहरे दीखते है तो साधु की तपस्या तक भांग हो जाती है।
खुद भ्रष्ट हो कर सीखा रहे है सही मूल्यांकन
ना जाने भ्रष्टाचार की कितनी सीढ़िया चढ़ने के बाद इन बड़ी बड़ी कुर्सियों पर बैठने वाले महानुभाव ने शायद अपनों को खोने का दुःख अपने भीतर नहीं पाला या फिर उनके पास रखे धन ने उस दुःख का एहसास ही नहीं होने दिया। कई संगठनों के प्रयासों के बावजूद अगर इन महानुभावों के सर पर जु तक नहीं रेंग रहीं है तो आप सोच सकते है और समझ भी सकते है की उनके सर पर कितने बड़े और कुशल लोगो का हाथ है। ऐसे कई छात्र है जिनके घर में कोरोना से कई मौत हो गई, आर्थिक रूप से उन्हें इस नियति ने निचोड़ लिया , शायद यह स्थिति भी हो की अब वो अकेले उस परिवार का आसरा हो, ऐसी अवस्था में इस देश की युवा पीढ़ी की जान जोखिम में डालना क्या जायज़ है। खुद वर्चुअल मोड पर मीटिंग लेने वाले, जब परीक्षा में इतनी सख्ती दिखाते है तो यह बात भी साफ़ हो जाती है की उन्हें सिर्फ एन्ड रिजल्ट देने से मतलब है।
कभी नहीं जताई हमदर्दी
अगर देखा जाए तो इस पुरे कोरोनाकाल में सरकार या किसी भी विश्वविद्यालय की ओर से छात्रों के प्रति ना ही कोई हमदर्दी दिखाई गई, ना ही कोई संवेदना
चाहे वो फीस में कटौती हो या फिर परीक्षा, जब प्रदेश की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी RGPV ऑनलाइन मोड में परीक्षा ले सकती है तो DAVV क्यों नहीं इस प्रश्न के उत्तर में कई राज़ छिपे है जनाब ! पर यह सियासी शतरंज में हमेशा से ही सत्ता रुपी वज़ीर को मारने का काम ढाई चाल चलने वाले आम लोगो ने ही किया है। युवा और आने वाला इस देश का कल सब देख रहा है। 2023 का चुनाव भी, कुलपति का इस तरह अपने फैसले पर कठोर रहने का कारण और इन महानुभवों का चुप रहना , युवा सब देख रहा है और शायद अब युवा अपनी ढाई चाल चलने की तैयारी कर रहा है, और सभी जानते है की वज़ीर का अंत अब दूर नहीं है। (पत्रकार)




