छठ महापर्व का आध्यात्मिक, सामाजिक और वैज्ञानिक आधार!

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आलेख:-डॉ. कल्याणी कबीर

सूर्य से ही सृष्टि है !

आज सभी लोग लोक आस्था का महापर्व छठ की तैयारियों में लीन हैं । इस पर्व में भक्त और भगवान दोनों के बीच प्रत्यक्ष साक्षात्कार होता है । बिहार राज्य में यह त्योहार प्रमुखता से मनाया जाता है और इस त्योहार के कारण ही बिहार को पूरे विश्व में एक अलग पहचान मिली हुई है ।

देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी लोग बहुत ही नियम और स्वच्छता का पालन करते हुए छठ पर्व करते हैं। छठ की कहानी सिर्फ आध्यात्मिक और धार्मिक ही नहीं बल्कि कई मायनों में वैज्ञानिक भी है और तार्किक भी है । साथ ही यह जीवन दर्शन से भी जुड़ा हुआ है । इस पर्व में हम सूर्य की पूजा करते हैं। सूर्य सृष्टि का सम्राट है। बिना इसके हम प्रकृति की कल्पना नहीं कर सकते। पूरे हिंदू धर्म में सूर्य को एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है। सूर्य एक ऐसे देवता हैं जिन्हें हम मूर्त रूप में प्रतिदिन देखते हैं और सूर्य की शक्तियों पर ही सृष्टि का हर कण , प्रकृति का हर रूप आधारित है । सुबह का आगमन मनुष्य के जीवन में उत्साह , उमंग और उम्मीदों का संचार करता है और इस भोर की बेला को सुबह की शक्तियों का स्रोत माना जाता है । छठ में सूर्य के साथ – साथ भोर की बेला की भी पूजा की जाती है। सुबह के समय सूर्य से निकलने वाली पहली किरण और शाम में भी जो सूर्य की अंतिम किरण होती है उसे हम प्रणाम करते हैं, अर्घय देते हैं ।

देखा जाए तो ऋग्वेद काल से ही सूर्य पूजा की परंपरा चली आ रही है। सूर्य की उपासना की चर्चा हमने महाभारत में ,भगवत पुराण में ,विष्णु पुराण में भी देखा है ।पर अब इस काल तक आते-आते सूर्य उपासना का पर्व छठ एक व्यवस्थित रूप में जनमानस में प्रतिष्ठित हो गया है और अब इसमें जाति – संप्रदाय की सीमा को तोड़ कर हर जनमानस के हृदय में अपनी जगह बना ली है । शिव की आराधना करने वाले भक्तगण सूर्य को एक मानवीय रूप में देखते हैं। वह मानते हैं कि सूर्य की उपस्थिति उनके सामने है इसलिए इस भक्ति में यथार्थ का बोध ज्यादा है। समय बदलने के साथ-साथ आज देश में कई जगह सूर्य की मूर्ति की स्थापना भी हुई और सूर्य देव के मंदिर भी बनाए गए हैं । लोग मानते हैं कि सूर्य की पूजा सिर्फ भक्ति भावना के कारण ही नहीं की जाती बल्कि इनका होना मानव के स्वास्थ्य के लिए भी बहुत आवश्यक है।

सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पाई गई है क्योंकि हम जानते हैं कि सूर्य की किरणों में विटामिन डी की मात्रा होती है जो हड्डियों के लिए और त्वचा की सेहत के लिए बहुत ही जरूरी होती है । प्राचीन काल में ऋषि – मुनियों ने भी अपने अनुसंधान में इस बात को महत्व दिया था और इसलिए भी सूर्य भगवान की उपासना को हम महत्वपूर्ण मानते हैं । इतना ही नहीं बल्कि यह पर्व जीवन दर्शन से जुड़ी बातों से भी हमारा साक्षात्कार कराता है ।

छठ पर्व में सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों ही समय भक्त समान मनोभाव से सूर्य की पूजा करते हैं, उन्हें जल का अर्घय देते हैं जो कहीं ना कहीं से यह संदेश देता है कि जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव और सुख दुख दोनों को समान मनोभाव के साथ आत्मसात करना चाहिए। यह अपने आप में एक बहुत बड़ी सीख है जो छठ पर्व के दौरान मानव समुदाय को मिलता है ।

इस पर्व के दौरान शीतकाल का आगमन होता है और बाजार में विटामिन सी से भरपूर मात्रा वाले फल होते हैं, जिनका सेवन शरीर के लिए ,रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए, त्वचा के लिए तो जरूरी होता है । साथ ही कोविड महामारी के दौर में तो विटामिन सी की मात्रा शरीर में होना अति आवश्यक है। स्वच्छता और सामाजिक दूरी का पालन इस त्यौहार में हमेशा से किया जाता रहा है। उम्मीद है कि इस साल भी यह पर्व सभी व्रतियों को और मानव समुदाय को एक स्वस्थ और कल्याणकारी वातावरण का आशीर्वाद देकर जाएगा ताकि कोविड-19 के भय से यह समाज मुक्त हो और छठ पर्व की परंपरा के प्रति हमारी आस्था और सुदृढ़ हो ।

डाॅक्टर कल्याणी कबीर जमशेदपुर झारखंड

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