विपत्तियों में केवल भगवन्नाम हीं सहारा होता है- पं०विश्वकान्ताचार्यजी

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कैमूर/भभुआ(ब्रजेश दुबे):

सुखसाधन युक्त लोगों के पास कयी विकल्प होता है जिसके कारण वह स्वयं में अपने को परिपूर्ण समझने लगते हैं,परन्तु यह सत्य है नहीं ।
क्योंकि दुनिया के संसाधनों से आप सुखानुभूति तो प्राप्त कर सकते हैं पर पारलौकिक आनंद तो पारब्रह्म परमेश्वर श्रीठाकुरजी के चरणारविन्द में प्रीति होने से हीं मिल सकता है । जहाँ पर विलास युक्त साधन का आंशिक भी महत्व नहीं है । वहाँ तो केवल और केवल जीव के अन्तःकरण से युक्त भक्ति और भगवन्नाम में विश्वास को देखा जाता है । उक्त बातें कैमूर जिला अन्तर्गत निसीजाँ गाँव में चल रही संगीतमय श्रीमद्भागवत्कथा के मंच से वृन्दावन, वाराणसी से चलकर आए हुवे अन्तर्राष्ट्रीय कथावाचक भागवत्मणी पूज्यश्री पंडित विश्वकान्ताचार्यजी महाराज ने कही
महाराज जी ने कहा कि जब कुन्ती कि बहू उत्तरा पर विपत्ति आती है ,अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र का संधान करता है उत्तरा के गर्भ को नष्ट करने के लिए, उस विपत्ति में उत्तरा ने नश्वर संसाधनों को छोडकर क्षणात हीं अनन्ययी होकर भगवान कृष्ण को पुकारी और मेरे गोविंद उसी समय कवच बन कर उत्तरा के गर्भ को आवेस्टित कर लेते हैं जिसके फलस्वरूप उस ब्रह्मास्त्र का प्रभाव भी निश्फल हो जाता है ।
कहने का तात्पर्य यह है कि विपत्ति में बस भगवान हीं साथ देते हैं । शुकाचार्यजी परिक्षित को कथा श्रवण कराते समय कहते हैं राजन धिरज,धैर्य,विश्वास और आस्था ए चारों मनुष्यों का रक्षण का कार्य करता है । मर्यादा में बंधकर रहने वालों का भगवान कभी भी परिक्षा नहीं लेते हैं । और चाहे जो भी हो किंचित कालके लिए भी संस्कार, मर्यादा को त्यागने वालों को अतिसय कष्ट झेलने पडते हैं । यही कारण था कि भगवान शिव के वचन को न मानने के कारण उनकी पत्नी माता सती को भी शिव से दुर हो जाना पडा,यहाँ तक कि गलती आभास हो जाने पर प्राणों कि आहुति तक देनी पड गई थी ।
कथाक्रम में मनुसतरुपा प्रसंगादी का गायन महाराज द्वारा किया गया । कथा के आयोजक रामेश्वरम उपाध्याय जी, संयोजक शिवकुमार शुक्ल जी के साथ साथ रोहतास एवं कैमूर जिले से श्रोताओं कि अपार उपस्थित रही।

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