कश्मीर से पहले बिहार के बाजारों में पहुंच रहा सेब, पश्चिम चम्पारण के किसानों ने लिखी सफलता की नई कहानी!

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रिपोर्ट – मनोज कुमार!

एक ऐसा फल जिसकी पहचान वर्षों से कश्मीर और हिमाचल प्रदेश से जुड़ी रही है। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। बिहार की धरती पर भी लाल-लाल सेब लहलहा रहे हैं और पश्चिम चम्पारण के किसान इस बदलाव की नई इबारत लिख रहे हैं। कभी दूसरे राज्यों से आने वाले सेब पर निर्भर रहने वाला बिहार अब खुद सेब उत्पादन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। पश्चिम चम्पारण, गया, बेगूसराय और मुजफ्फरपुर सहित कई जिलों में किसान व्यवसायिक स्तर पर सेब की खेती कर रहे हैं और अच्छी आमदनी भी कमा रहे हैं।

पश्चिम चम्पारण के नौतन प्रखंड स्थित बैकुंठवा गांव के किसान शिशिर दूबे ने दो वर्ष पहले अपने खेत में करीब 70 सेब के पौधे लगाए थे। आज वे पौधे फलों से लदे हुए हैं। हर पेड़ से 8 से 10 किलो तक सेब का उत्पादन हो रहा है। सबसे खास बात यह है कि इन सेबों की गुणवत्ता, मिठास, रंग और आकार किसी भी पहाड़ी प्रदेश में होने वाले सेब से कम नहीं है।
शिशिर दूबे बताते हैं कि शुरुआत में लोगों को विश्वास नहीं था कि बिहार जैसी गर्म जलवायु में सेब की खेती सफल हो सकती है। लेकिन आज जब पौधों पर लाल रंग के चमकदार सेब दिखाई दे रहे हैं, तो लोग दूर-दूर से उनके बगीचे को देखने पहुंच रहे हैं और खेती की तकनीक के बारे में जानकारी ले रहे हैं।

सेब की खेती का यह सफर सिर्फ किसानों तक ही सीमित नहीं है। बेतिया शहर के व्यवसायी मेराजुल हक भी इस अभियान का हिस्सा बने हैं। पर्यावरण संरक्षण और हरियाली के प्रति विशेष लगाव रखने वाले मेराजुल हक अपने आवास और परिसर में वर्षों से विभिन्न प्रकार के पौधे लगाते रहे हैं। इसी शौक और पर्यावरण प्रेम के चलते उन्होंने अपने गार्डन और पौधों के बीच सेब के कई पौधे लगाए, जो अब फल देने लगे हैं।
मेराजुल हक बताते हैं कि जब उन्होंने पहली बार बिहार में सेब की खेती के बारे में सुना तो उत्सुकता बढ़ी। उन्होंने प्रयोग के तौर पर पौधे लगाए और आज उनके पौधों पर भी अच्छी संख्या में सेब लग रहे हैं। उनका मानना है कि यदि लोग अपने घरों और बगीचों में फलदार पौधे लगाएं तो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक लाभ भी प्राप्त किया जा सकता है।

पश्चिम चम्पारण के अलावा मझौलिया के रविकांत पांडे और रामनगर के किसान विजय गिरी भी सेब की खेती में सफलता हासिल कर रहे हैं। इन किसानों के बागानों में दर्जनों पौधे फल दे रहे हैं और लगातार उत्पादन बढ़ रहा है। किसानों का कहना है कि आने वाले समय में जिले में सेब की खेती बड़े पैमाने पर फैल सकती है।

बिहार में उगाए जा रहे सेब की सबसे बड़ी खासियत इसकी समय से पहले उपलब्धता है। जहां हिमाचल और कश्मीर में सेब की हार्वेस्टिंग सितंबर और अक्टूबर महीने में होती है, वहीं बिहार में जून और जुलाई तक इसकी तुड़ाई पूरी हो जाती है। इसका सीधा फायदा किसानों को मिलता है क्योंकि बाजार में दो महीने पहले ही उनका उत्पाद पहुंच जाता है और उन्हें बेहतर कीमत प्राप्त होती है।

वर्तमान में पश्चिम चम्पारण में यह सेब 200 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है, जबकि कई स्थानों पर इसकी कीमत 250 रुपये प्रति किलो तक पहुंच रही है। मांग अधिक होने के कारण उपभोक्ता भी इसे खुशी-खुशी खरीद रहे हैं। स्वाद की बात करें तो यह सेब बेहद मीठा, रसीला और आकर्षक लाल रंग का होता है। शुरुआत में इसका रंग हरा रहता है लेकिन पकने के बाद यह पूरी तरह लाल हो जाता है।

किसानों द्वारा उगाई जा रही यह विशेष किस्म HRMN-99 (हरमन-99) है। यह किस्म खास तौर पर गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों के लिए विकसित की गई है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक की भीषण गर्मी में भी पौधे आसानी से विकसित होते हैं और पौधारोपण के एक से दो वर्ष के भीतर फल देना शुरू कर देते हैं।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यह किस्म बिहार के किसानों के लिए आय का नया स्रोत बन सकती है। कम समय में फल देने वाली यह फसल किसानों को पारंपरिक खेती के मुकाबले बेहतर लाभ देने की क्षमता रखती है। यदि सरकारी स्तर पर तकनीकी सहायता और बाजार की बेहतर व्यवस्था मिले तो बिहार भविष्य में सेब उत्पादन के क्षेत्र में नई पहचान बना सकता है।

आज पश्चिम चम्पारण के खेतों, बागानों और घरों के आंगनों में लहलहाते सेब के पौधे इस बात का प्रमाण हैं कि खेती में नवाचार और नई सोच के जरिए असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। किसान शिशिर दूबे की मेहनत हो या पर्यावरण प्रेमी व्यवसायी मेराजुल हक का प्रयास, सभी मिलकर बिहार में सेब उत्पादन की एक नई कहानी लिख रहे हैं।

कभी पहाड़ों की पहचान माना जाने वाला सेब अब बिहार की मिट्टी में भी सफलता की नई फसल बन चुका है। पश्चिम चम्पारण के किसानों और पर्यावरण प्रेमियों की यह पहल न सिर्फ कृषि क्षेत्र में बदलाव ला रही है, बल्कि यह संदेश भी दे रही है कि इच्छाशक्ति, तकनीक और मेहनत के दम पर खेती की नई संभावनाओं के द्वार खोले जा सकते हैं। बिहार का यह लाल सेब अब देशभर में अपनी अलग पहचान बनाने की ओर बढ़ रहा है।

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