आजीविका पुनर्वास सम्मेलन का आयोजन हुआ!

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धीरज शर्मा के साथ निलाम्बुज कुमार झा

रविवार को पी एन ए कॉलेज परिसर में भागलपुर जिला जल श्रमिक संघ एवं गंगा मुक्ति आंदोलन के संयुक्त बैनर तले आजीविका पुनर्वास सम्मेलन का आयोजन हुआ । सम्मलेन की अध्यक्षता योगेंद्र सहनी और संचालन श्री रविंद्र कुमार सिंह ने किया ।सम्मेलन का बिषय प्रवेश करते हुए गौतम मल्लाह ने कहा कि इस सम्मेलन का मकसद जल श्रमिकों को संगठित कर उसकी आजीविका और पुनर्वास के संघर्ष को मजबूत करना है । संस्कृतिकर्मी और गंगा मुक्ति आंदोलन के संगठक रहे उदय ने कहा कि भारत मछली उत्पादन करने वाले शीर्ष देशों में गिना जाता है। कहा जाता है कि हम नीली क्रांति में अब्बल हो गए । यही है इस विकास की बिडंबना कि मछली का उत्पादन बढ़ गया और पारंपरिक मछुआरे बेरोजगार हो गए। मछलियों के प्राकृतिक घर नदियों को मार दिया गया ,जहां मछली उत्पादन में कोई खर्च नहीं था। दूसरी तरफ कृतिम तरीके से मत्स्य पालन को बढ़ावा देने का स्वांग रचा जा रहा है ,जिसमें मछली के जीरा (स्पॉन ) से लेकर मछलियों के चारा तक में बड़े खिलाड़ी लगे हुए हैं । रामपूजन ने कहा कि गंगा मुक्ति आंदोलन और जल श्रमिक संघ ने भागलपुर जिले में सुल्तानगंज से पीरपैंती तक कुल 80 किलोमीटर तक गंगा को जमींदारों से मुक्त कराया . जमींदारी से मुक्ति के तुरत बाद 1991 में संयुक्त बिहार की तमाम नदियां पारम्परिक मछुआरों के लिये कर मुक्त किया गया ताकि पारंपरिक मछुआरों की आजीविका सुनिश्चित हो सके। सुनील सहनी ने कहा कि कर मुक्ति से पहले ही भागलपुर में डॉल्फिन सेंचुरी की घोषणा हो चुकी थी। इसका मतलब सेंचुरी क्षेत्र में भी मछुआरों के लिए कर मुक्ति रहेगी और मछुआरे अपनी आजीविका चलाएंगे ऐसा सोचा गया था। सेंचुरी एक्ट में भी ऐसा कहीं नहीं लिखा गया है कि सेंचुरी क्षेत्र में सारी गतिविधियां बंद रहेगी, परन्तु कुछ विकास के दल्लों और अधिकारियों कर्मचारियों की मिलीभगत से मछुआरों को मछली मारने से वंचित किया जा रहा है। मछुआरे तो डॉल्फिन के स्वाभाविक मित्र हैं ,इसलिए वे इसे बचाना चाहते हैं . संतोष सहनी ने मछुआरों को ट्राइब का दर्जा देने एवं संख्या के अनुपात में आरक्षण की बात की। गंगा मुक्ति आंदोलन के प्रमुख कर्णधारों में से एक ति मां भागलपुर विश्विद्यालय के प्राध्यापक डॉ योगेंद्र ने कहा कि गंगा में एक बूंद गंगा का पानी नहीं है ,जो पानी दिखता है वह शहरों के नालों का है, नदियां प्रदूषण से लबालब हैं। जब नदी ही नहीं बचेगी तो मछुआरे और डॉल्फिन कैसे बचेंगे। गंगा मुक्ति आंदोलन के राष्ट्रीय समन्वयक श्री रामशरण ने नई पीढ़ी को आगे आने की बात की बात कही। सम्मेलन में यह प्रस्ताव लिया गया कि जल श्रमिक संघ नदी पानी , आजीविका पर काम करने वालों को एक मंच पर लाने का पहल करेगा , राज्य स्तरीय पटना में एक कार्यक्रम करने का भी फैसला लिया गया। युवा प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने का भी प्रस्ताव लिया गया। सम्मलेन के जरिये ये मांग किया गया कि पारम्परिक मछुआरों को पूर्व की भांति मुख्य नदी सहित सभी कोल ढाब और नालों पर निःशुल्क मछली मारने का अधिकार मिले और इसके लिए बिहार सरकार एक बिल पारित कर एक्ट बनाये। किसानों की तरह मछुआरों को भी 6 हजार वार्षिक देने की मांग की गई । दिलदारपुर और सिंचाई विभाग कहलगांव सहित तमाम विस्थापितों को यथा शीघ्र बसाने का भी प्रस्ताव लिया गया। वन विभाग द्वारा डॉल्फिन सेंचुरी क्षेत्र में मछुआरों को मछली पकड़ने से रोकने ,उसे प्रताड़ित करने और उनपर झूठा मुकदमा करने की भर्त्सना की गई तथा सेंचुरी क्षेत्र में मछली पकड़ने के दावेदारी आंदोलन को तेज करने का निर्णय लिया। मत्स्य विभाग द्वारा अवैध तरीके से जलकर का नाम बदलकर बंदोबस्ती के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन का निर्णय लिया गया। यह भी प्रस्ताव लिया गया कि जल श्रमिक संघ और गंगा मुक्ति आंदोलन एन ए पी एम , नेशलन फीस वर्कर फोरम , राष्ट्र सेवा दल , संघर्ष वाहिनी समन्वय समिति आदि के साथ मिलकर पहल तेज करेगा। सम्मेलन को गति देने में डॉ योगेंद्र ,रामशरण ,उदय ,रविंद्र कुमार सिंह ,रामपूजन , सार्थक भरत , राधादेवी ,नरेश महलदार , महेंद्र महलदार ,रणजीत मंडल , अशोक सहनी , दशरथ सहनी , सूरज सहनी ,अजय सहनी , संतोष सहनी ,अर्जुन सहनी ने बहुमूल्य योगदान किया . धन्यवाद ज्ञापन गौतम मल्लाह ने किया।

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