रिपोर्ट :- संतोष चौहान!
कोर्ट के आदेश के बावजूद Distress Warrant की तामिला नहीं, सुपौल फैमिली कोर्ट ने मधेपुरा पुलिस की कार्यशैली पर जताई नाराजगी
सुपौल :- परिवार न्यायालय, सुपौल ने एक भरण-पोषण मामले में न्यायालय द्वारा जारी Distress Warrant की तामिला नहीं होने को गंभीरता से लिया है। 11 अगस्त 2026 को पारित आदेश में न्यायालय ने पूर्व में दिए गए निर्देशों के अनुपालन की स्थिति पर नाराजगी जताई है। मामला विविध वाद संख्या 02/2025 से संबंधित है और इसमें मधेपुरा जिले के गम्हरिया थाना पुलिस की भूमिका का उल्लेख किया गया है।
न्यायालय के आदेश के अनुसार, मामला भरण-पोषण वाद संख्या 07/2019 में 1 मार्च 2024 को पारित आदेश के क्रियान्वयन से जुड़ा है। आवेदिका की ओर से विपक्षी पवन कुमार के विरुद्ध बकाया राशि की वसूली के लिए कार्रवाई की मांग की गई थी। इसी क्रम में न्यायालय द्वारा 4 अगस्त 2025 को विपक्षी के विरुद्ध Distress Warrant जारी करने का आदेश दिया गया। इसके बाद 18 अगस्त 2025 को भी Distress Warrant निर्गत किया गया।
न्यायालय के रिकॉर्ड में दर्ज है कि उक्त वारंट की तामिला गम्हरिया थाना, जिला मधेपुरा द्वारा नहीं कराई गई। इसके बाद न्यायालय की ओर से 17 जनवरी 2026 और 27 मई 2026 को गम्हरिया थानाध्यक्ष को Distress Warrant की तामिला कराने के लिए पत्र भेजे गए। इसके बावजूद आदेश के अनुपालन को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हुई।
मामले में परिवार न्यायालय द्वारा 25 जून 2026 को भी आदेश पारित किया गया था। इसमें पुलिस अधीक्षक, मधेपुरा को गम्हरिया थानाध्यक्ष के वेतन पर अगले आदेश तक रोक लगाने तथा न्यायालय द्वारा पारित आदेश के अनुपालन का प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, 11 अगस्त 2026 के आदेश में न्यायालय ने उल्लेख किया कि निर्धारित समय सीमा तक अनुपालन प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया गया।
न्यायालय ने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि न्यायालय द्वारा पारित आदेश के अनुपालन में लापरवाही हुई है। आदेश में इस संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा Sarfaraz Alam बनाम State of Bihar मामले में 12 सितंबर 2022 को पारित आदेश का भी उल्लेख किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, लंबित और निष्पादित नहीं हुए Distress Warrant की सूची संबंधित पुलिस अधीक्षक को भेजी जानी चाहिए तथा यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सक्षम न्यायालय द्वारा रोक नहीं लगाए जाने की स्थिति में वारंट का निर्धारित अवधि में निष्पादन हो। इसके बाद निष्पादन रिपोर्ट भी संबंधित परिवार न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किए जाने का प्रावधान है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश में यह भी व्यवस्था दी गई है कि यदि Distress Warrant का निष्पादन नहीं होता है और उसके लिए उचित स्पष्टीकरण उपलब्ध नहीं कराया जाता है, तो संबंधित अधिकारी से शपथपत्र के माध्यम से जवाब मांगा जा सकता है। न्यायालय के आदेश की जानबूझकर अवहेलना पाए जाने की स्थिति में अवमानना की कार्रवाई की प्रक्रिया भी अपनाई जा सकती है।
फिलहाल सुपौल परिवार न्यायालय के इस आदेश के बाद न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन और पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही का मुद्दा चर्चा में है। अब देखना होगा कि मधेपुरा पुलिस की ओर से इस मामले में आगे क्या कार्रवाई की जाती है और न्यायालय के निर्देशों का अनुपालन किस प्रकार सुनिश्चित किया जाता है।




