मुख्यमंत्री ने बिहार के तीन पारंपरिक उत्पादों को GI टैग मिलने पर जताई प्रसन्नता!

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:- रवि शंकर अमित!

राज्य सरकार पारंपरिक उद्योगों, हस्तशिल्प, हथकरघा एवं लोक कलाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रतिबद्ध है।

पटना, 13 जून 2026
मुख्यमंत्री श्री सम्राट चौधरी ने नालंदा की बावन बूटी साड़ी एवं फैब्रिक, गया के पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट तथा भोजपुर की पिढ़िया पेंटिंग को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्राप्त होने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए राज्य के शिल्पकारों, बुनकरों, कलाकारों एवं संबंधित सभी संस्थाओं को बधाई दी है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह उपलब्धि बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक कला-कौशल और ग्रामीण प्रतिभा को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने वाली है। उन्होंने कहा कि बिहार की लोक कला, हस्तशिल्प एवं हथकरघा परंपराएं राज्य की अमूल्य धरोहर हैं और GI टैग मिलने से इन उत्पादों की विशिष्ट पहचान को कानूनी संरक्षण के साथ-साथ वैश्विक बाजार में नई प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि नालंदा की बावन बूटी बुनकरी, गया की पत्थर शिल्पकला और भोजपुर की पिढ़िया पेंटिंग बिहार की सांस्कृतिक विविधता और सृजनात्मक परंपरा के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इन उत्पादों को GI टैग मिलना राज्य के कारीगरों और बुनकरों के वर्षों के परिश्रम, कौशल एवं समर्पण का सम्मान है।
मुख्यमंत्री ने इस उपलब्धि के लिए राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड), संबंधित विभागों, उत्पादक समूहों, शिल्पकार संगठनों तथा सभी हितधारकों के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने विशेष रूप से उन कारीगरों, बुनकरों एवं महिला कलाकारों को बधाई दी, जिन्होंने पीढ़ियों से इन परंपरागत कलाओं को जीवित रखा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार पारंपरिक उद्योगों, हस्तशिल्प, हथकरघा एवं लोक कलाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रतिबद्ध है। GI टैग मिलने से इन उत्पादों के विपणन, ब्रांडिंग और निर्यात की संभावनाएं बढ़ेंगी, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार एवं स्वरोजगार के नए अवसर सृजित होंगे और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह उपलब्धि बिहार के अन्य पारंपरिक उत्पादों को भी राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए प्रेरित करेगी तथा ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प को और अधिक सशक्त बनाएगी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि बिहार की सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक कलाओं के संरक्षण की दिशा में यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, जिस पर पूरे बिहार को गर्व है।

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