रिपोर्ट- सुमित कुमार!
– जातीय जनगणना करने से सरकार के द्वारा जातीय जनगणना कराने की घोषणा पर प्रशांत किशोर ने कहा , बिहार में जातीय जनगणना पहले हीं हो चुकी है, जातीय जनगणना करने से समाज का सुधार नहीं होगा, जातीय जनगणना में जो आंकड़े आयेंगे उसपर योजना बनाकर उसपर काम होगा तब सुधार होगा।
राजस्व विभाग समाज से लोगों से धन उगाही का सबसे बड़ा जरिया बना हुआ है
-जाति जनगणना को लेकर पिछले कुछ वर्षों से तेज हुई राजनीति के बीच अब केंद्र सरकार ने भी इसकी घोषणा कर दी है। बुधवार को राजनीतिक मामलों की कैबिनेट कमिटी ने जनगणना के साथ जाति गणना को हरी झंडी दे दी है। आजादी के बाद यह पहली होगा क्योंकि अब तक कई बार जाति सर्वे तो हुए लेकिन पूरी गणना नहीं हुई। यही कारण है कि सरकार की ओर से फैसले की घोषणा के साथ फिर से राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई। वहीं मामले में जनसुराज पार्टी के सूत्रधार और राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कहा कि जातीय जनगणना तो केंद्र सरकार अभी घोषित की है, बिहार में जातीय जनगणना 2 से 3 वर्ष पूर्व हो चुका हैं। यहां पर तो सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि जो जातीय जनगणना हुआ उससे जो नतीजे निकले उसपर सरकार ने क्या किया। यही भाजपा और नीतीश की सरकार है जिन्होंने कहा कि 94 लाख गरीब परिवारों को 2-2 लाख रुपया दिया जायेगा। किसी को एक रुपया भी नहीं मिला है। जातीय जनगणना में यह बताता गया कि सिर्फ 3 प्रतिशत दलित समाज के बच्चे 12 वीं पास कर रहे है। 5 प्रतिशत से कम अतिपिछड़ा समाज के बच्चे 12 वीं पास कर रहे है। तो सरकार ने उस पर कोई कार्यवाही तो की नहीं। जातीय जनगणना करने से समाज का सुधार नहीं होगा। जातीय जनगणना में जो आंकड़े आयेंगे उसपर योजना बनाएगा उसपर काम कीजियेगा तब न सुधार होगा। किताब खरीदने से आदमी विद्वान नहीं होता है। किताब को पढ़ना पड़ेगा तब न सुधार होगा। दलितों की गणना तो 78 सालों से हो रही है। मुसलमानों की गणना 18 सालों से हो रही है। ये आंकड़े बता रहे है कि ये लोग गरीब है शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से अतिपिछड़े हैं लेकिन उनकी दशा नहीं सुधरी, तो सिर्फ गणना करने मात्र से सुधार नहीं होगा। राजनीतिक रोटी सेक कर समाज को बांट कर सामाजिक उन्माद फैला कर वोट लेने का अगर सोच है तो ये सफल नहीं होने वाला है जिन्हें चुनकर लोगों ने वहां बैठाया है। सरकार में लोग बैठे और विपक्ष में भी लोग बैठे हैं उनका काम है कि देश की सुरक्षा सुनिश्चित करें। पूरी जनता उनके साथ है। लेकिन यहां पर रोजगार की बात हैं, पढ़ाई की बात है। प्रशांत किशोर ने कहा कि आप देख रहे है कि जनता क्या चाहती है, सारी जनता बदलाव चाहती है। लालू नीतीश के 35 साल के कुशासन से मुक्ति चाहती है। बिहार में लोग जनता का राज चाहती है जनसुराज चाहते है। अपने बच्चों के लिए शिक्षा और रोजगार चाहते है। जो लोग कहता है कि बिहार में हर आदमी जाति पर वोट देता है आप देखिए इसमें किस जाति के लोग नहीं है। बहुत हो गया जात पात बहुत हो गया हिन्दू मुसलमान, हमलोगों को अपने बच्चों के लिए पढ़ाई चाहिए, रोजगार चाहिए। जातीय जनगणना तो केंद्र सरकार अभी घोषित की है, बिहार में जातीय जनगणना 2 से 3 वर्ष पूर्व हो चुका हैं। यहां पर तो सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि जो जातीय जनगणना हुआ उससे जो नतीजे निकले उसपर सरकार ने क्या किया। यही भाजपा और नीतीश की सरकार है जिन्होंने कहा कि 94 लाख गरीब परिवारों को 2-2 लाख रुपया दिया जायेगा। किसी को एक रुपया भी नहीं मिला है। जातीय जनगणना में यह बताता गया कि सिर्फ 3 प्रतिशत दलित समाज के बच्चे 12 वीं पास कर रहे है। 5 प्रतिशत से कम अतिपिछड़ा समाज के बच्चे 12 वीं पास कर रहे है। तो सरकार ने उस पर कोई कार्यवाही तो की नहीं। जातीय जनगणना करने से समाज का सुधार नहीं होगा। जातीय जनगणना में जो आंकड़े आयेंगे उसपर योजना बनाएगा उसपर काम कीजियेगा तब न सुधार होगा। किताब खरीदने से आदमी विद्वान नहीं होता है। किताब को पढ़ना पड़ेगा तब न सुधार होगा। दलितों की गणना तो 78 सालों से हो रही है। मुसलमानों की गणना 18 सालों से हो रही है। ये आंकड़े बता रहे है कि ये लोग गरीब है शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से अतिपिछड़े हैं लेकिन उनकी दशा नहीं सुधरी, तो सिर्फ गणना करने मात्र से सुधार नहीं होगा। राजनीतिक रोटी सेक कर समाज को बांट कर सामाजिक उन्माद फैला कर वोट लेने का अगर सोच है तो ये सफल नहीं होने वाला है ।
राजस्व विभाग समाज से लोगों से धन उगाही का सबसे बड़ा जरिया बना हुआ है
पहले हम लोग सवाल नहीं उठा रहे हैं, सवाल जनता उठा रही है बिहार में राजस्व विभाग समाज से लोगों से धन उगाही का सबसे बड़ा जरिया बना हुआ है जो जमीन आपकी थी, उसी का रसीद कटाने के लिए उसी का डिजिटाइजेशन के नाम पर उसी की जमाबंदी और दाखिल खारिज के नाम पर घर हर गांव परिवार में दस हज़ार बीस, हज़ार पच्चास हज़ार रुपए लिया जा रहा है सरकार ने ये कहा कि लैंड सर्वे के जरिए डिजिटाइजेशन करके हम लोग भूमि में जो परेशानी है भूमि के रिकॉर्ड्स में परेशानी है उसको सुधार लेंगे ये करीब चार वर्ष से चल रहा है और फरवरी में सरकार ने बिहार सरकार ने आंकड़ा जारी किया है, जिसमें बताया है कि अभी तक सिर्फ बीस प्रतिशत इसको याद रखिए बीस प्रतिशत बिहार की जमीन का ही सर्वेक्षण और डिजिटाइजेशन का काम पूरा किया गया है और हजारों करोड़ रूपया लोगों से वसूला जा रहा है तो इन बिहार के बाद जिन राज्यों में ये सर्वेक्षण का डिजिटाइजेशन का काम शुरू हुआ तेलंगाना में आंध्रा में काम पूरा हो गया दो वर्ष में ।लेकिन बिहार सरकार के पास संसाधन है ना व्यवस्था है ना टेक्नोलॉजी है ना राजनीतिक इच्छा शक्ति है कि इसको किया जाए । अब सर्वेक्षण के आधार पर परमानेंट वसूली का जरिया सीओ वीडियो और डीएसएलआर जैसे जो जमीन के मामलों से जुड़े हुए हैं वह खुलकर पैसा ले रहे हैं और हर गांव से पैसा वसूला जा रहा है मैं रोज कमरे पर कह रहा हूं शायद डीसीएलआर का की पोस्टिंग में इतना पैसा इतना घुस कभी नहीं लिया जा रहा था जितना अभी लिया जा रहा है एक-एक सीओ की पोस्टिंग में लोग बताते हैं 20लाख 30लाख 40 लख रुपए लिया जा रहा है घुस जब 30 लाख रुपया देखकर कोई डीएसएलआर अंचलाधिकारी आएगा तो पैसा हमसे आपसे वसूलेगा गेंहू बेचकर तो पैसा लेगा नहीं ।
बाइट – प्रशांत किशोर ,अध्यक्ष जन सुराज




