आलेख :- उज्जवल प्रिंस
बिहार में जान संवाद कितना कमजोर !
उज्ज्वल प्रिन्स के कलमों से——बिहार के सभी जिलों में जन संवाद कार्यक्रम किया जा रहा है , मुख्य रूप से इस संवाद कार्यक्रम में जिला के जिला अधिकारी को जाना है और अपनी सरकार के कार्यों एवम् योजनाओं की जानकारी आम लोगों के बीच देना है और साथ ही आम लोगों की कठनाइयों को भी जानना और कठनाइयों का निवारण करना है।
वास्तिवक्ता अब यह भी है कि जिला में जिला अधिकारी के लिए जहाँ सहूलियत होती है जाने में वहाँ ख़ुद जाते हैं।
अब सवाल यह है कि क्या सहूलियत होनी चाहिए ?

परिणाम स्वरूप जैसा कि… जिस उद्देश व स्थान में जाना है वहाँ के लिए सड़क ख़राब तो नहीं है , कहीं जाने-आने के क्रम में सड़क काफ़ी ख़राब है तो अधिकारीयों के शरीर जंपिंग डांस ना करने लगे और इसके वजह से साहब को ना चाहते हुए भी उस समस्याओं का सामना करना पड़ेगा ।
जहां आम लोग रोज़ और काफ़ी लंबे समय से उसी ख़राब सड़क का सामना करते आ रहे हैं और आख़िर जन संवाद भी उन्हीं लोगों के लिए करनी है ।
दूसरी मुख्य बात का ध्यान रखना है कि जिला मुख्यालय से दूरी कितनी है जिस स्थान पर संवाद करनी है ?
सरकार की बात व योजनाओं के पक्ष में दूरी तय करने के बाद और उस सुदूर स्थान पर कोई वंचित व्यक्ति आक्रोश में अपनी बात तो नहीं रख दे इसे भी ध्यान में रखना है !
अच्छा.., इस जन संवाद में जिला के पुलिस अधीक्षक को भी होना है ताकि पुलिस ने भी अपने जिला में जो कार्य ,विधि – व्यवस्था और अपराध नियंत्रण के जिस-जिस बिंदु पर कार्य किया है उसपर लोगों के बीच चर्चा करनी हैं साथ ही सरकार ने पुलिसिंग में आमूलचुर बदलाव करने की हर संभव काम कर रही है और अगर किसी थाने में किसी की शिकायत दर्ज नहीं हुई हो या किसी की अपनी समस्या का कोई हल नहीं हुआ तो वो भी जानना है और किसी पुलिस कर्मी की शिकायत मिली तो जाँच-पड़ताल के बाद आरोपित पुलिस ग़लत पाया गया तो उस पर एक्शन भी ।
पर ख़बर ये नहीं जो अपने अबतक पढ़ा ख़बर ये है कि बड़ी मछली छोटी मछली को निगल लेती है ।
आख़िर एक सरकार के संवाद कार्यक्रम में ये बड़ी और छोटी मछली कहाँ से आ गई ?
संवाद कार्यक्रम अब यह भी सही है कि हर जगह पर डीएम और एसपी का जाना संभव नहीं है चूकि जिला के सबसे वरीय अधिकारी होने के कारण इनका कार्यक्षेत्र और कार्यभार काफ़ी बड़ा के साथ साथ अस्त–व्यस्त भी होता है ।
अच्छा अब एक नया विकल्प चला है संवाद कार्यक्रम को लेकर , अधिकारीयों में । जानता के बीच दरअसल जाना है अधिकारियों को और यह कोई निश्चित भी सरकार के द्वारा भी किया गया है कि सिर्फ़ डीएम और। एसपी साहब को ही जन संवाद के लिए जाना है। कार्यक्रम को स्थापित करने के लिए डीएम साहब डीडीसी या एसडीएम को भेज देते हैं वहीं, एसपी साहब अपने डीएसपी को भेज देते हैं , एसडीएम साहब बीडीओ साहब को और डीएसपी साहब अपने इंस्पेक्टर या स्थानीय थाना प्रभारी को भेज देते हैं अपने सहूलियत के हिसाब से ! अब सवाल ये है कि इसमें दिक़्क़त क्या है..? जन संवाद हो ही रहा है ना ? जन संवाद तो बिलकुल हो रही है? पर इस सहूलियत के हिसाब में दरअसल वास्तविकता से दूरी बन जाती है जो सबसे मुख्य बात साबित होती है कहीं ना कहीं बदलाव में ।
सड़क की हालत, गाँव की हालत , सरकारी योजनाओं का धरातल तक दिखना व समीक्षा करना , आम लोगों की सच्चाई जिसमें विशेष कर ग़रीब व वंचित लोगों का अपना दर्द !
किसानों की अपनी चिंता ?
इन सबसे वरीय अधिकारी व सक्षम अधिकारी अपने सहूलियत के चक्कर से दूर हो जाते हैं! बिहार के सभी जिलों में जन संवाद कार्यक्रम किया तो जा रहा है परंतु मुख्य रूप से इस संवाद कार्यक्रम में जिला के जिला अधिकारी को जाना है जो सबसे अधिक ज़रूरी होगी और अपनी सरकार की कार्यों एवम् योजनाओं की जानकारी आम लोगों के बीच देना है और साथ ही आम लोगों की कठनाइयों को भी जानना और उनके कठनाइयों का निवारण भी करना है।
वास्तिवक्ता अब यह भी है कि जिला में जिला अधिकारी के लिए जहाँ सहूलियत होती है जाने-आने को लेकर वहाँ ख़ुद चले भी जाते हैं।
अब सवाल यह है कि क्या सहूलियत होनी चाहिए जो अबतक देखा जा रहा है ?
परिणाम स्वरूप जैसा कि… जिस उद्देश व स्थान में जाना है वहाँ के लिए सड़क अच्छी है या नही , कहीं आने-आने के क्रम में सड़क काफ़ी ख़राब है तो शरीर को कष्ट ना हो और इसके वजह से साहब को ना चाहते हुए भी उस समस्याओं का सामना करना होगा जहां आम लोग रोज़ और काफ़ी लंबे समय से उसी कष्ट का सामना करते आ रहे हैं ।
दूसरी मुख्य बात का ध्यान रखना है कि जिला मुख्यालय से दूरी कितनी है ? सरकार की बात व योजनाओं के पक्ष में दूरी तय करने के बाद और उस सुदूर स्थान पर कोई वंचित व्यक्ति आक्रोश में अपनी बात तो नहीं रख दे इसे भी ध्यान में रखना है !
अच्छा.., इस जन संवाद में जिला के पुलिस अधीक्षक को भी होना है ताकि पुलिस ने भी अपने जिला में जो कार्य ,विधि – व्यवस्था और अपराध नियंत्रण के जिस-जिस बिंदु पर कार्य की है उसपर लोगों के बीच चर्चा करनी हैं साथ ही राज्य सरकार ने पुलिसिंग में आमूलचुर बदलाव करने की हर संभव काम कर रही है और अगर किसी थाने में किसी का शिकायत नहीं दर्ज हुई हो या किसी की अपनी समस्या का कोई हल नहीं हुआ तो वो भी जानना है और किसी पुलिस कर्मी की शिकायत मिली तो जाँच-पड़ताल के बाद आरोपित पुलिस ग़लत पाया गया तो उस पर एक्शन भी !
पर ख़बर ये नहीं जो अपने अबतक पढ़ा ख़बर ये है कि बड़ी मछली छोटी मछली को निगल लेती है ।
आख़िर एक सरकार के संवाद कार्यक्रम में ये बड़ी और छोटी मछली कहाँ से आ गई ?
संवाद कार्यक्रम अब यह भी सही है कि हर जगह पर डीएम और एसपी का जाना संभव नहीं है चूकि जिला के सबसे वरीय अधिकारी होने के कारण इनका कार्यक्षेत्र और कार्यभार काफ़ी बड़ा के साथ साथ अस्त –व्यस्त भी होता है ।
अच्छा अब एक नया विकल्प चला है अधिकारीयों के बीच दरअसल जाना है डीएम साहब को पर वहाँ डीएम साहब डीडीसी या एसडीएम को भेज देते हैं वहीं एसपी साहब डीएसपी को भेज देते है
एसडीएम साहब बीडीओ साहब को और डीएसपी साहब इंस्पेक्टर या थाना प्रभारी को भेज देते हैं अपने सहूलियत के हिसाब से ! अब सवाल ये है कि इसमें दिक़्क़त क्या है..? जन संवाद हो ही रहा है ना ?
जन संवाद तो बिलकुल हो रही है?
सड़क की हालत, गाँव की हालत , सरकारी योजनाओं का धरातल तक पहुंच, आम लोगों की सच्चाई जिसमें विशेष कर ग़रीब व वंचित लोगों का अपना दर्द !
किसानों की अपनी चिंता ?
इन सबसे वरीय अधिकारी व सक्षम अधिकारी अपने सहूलियत के चक्कर से दूर हो जाते हैं !




