कैमूर/भभुआ(ब्रजेश दुबे):
कोरोना के संक्रमण से बचाव के लिए स्वास्थ्य विभाग एवं जनमानस अपने अपने स्तर से प्रयासरत हैं। गर्भावस्था में मधुमेह से पीड़ित महिलाएं अब शहरों के साथ गाँवों में भी पाई जाने लगी हैं। इसलिए सरकार गैर-संचारी रोग कार्यक्रम के तहत ऐसे मरीजों को लाभ पहुँचाने के लिए कार्य कर रही है एवं इसके उचित प्रबंधन एवं उपचार के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों से लेकर जिला स्वास्थ्य इकाई पर विशेष सुविधा भी उपलब्ध करायी है। सिविल सर्जन डॉ मीना कुमारी ने बताया गर्भावस्था में मधुमेह से पीड़ित महिलाओं में यदि समय से उपचार नहीं हो तब आगे चलकर प्रसूता एवं गर्भस्थ शिशु में विभिन्न जटिलताएं हो सकती हैं एवं दोनों टाइप-2 मधुमेह से पीड़ित हो सकते हैं। इससे गर्भवती में संक्रमण, प्रसव अवधि में बढ़ोतरी, जटिलतापूर्ण प्रसव, सिजेरियन प्रसव, प्रसव के बाद गर्भाशय का सिकुड़ नहीं पाना एवं प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव जैसी जटिलता हो सकती हैं , जिससे प्रसूता की जान भी जा सकती है। गर्भावस्था जनित मधुमेह से गर्भस्थ शिशु को भी समस्या हो सकती है. इससे गर्भस्थ शिशु की मृत्यु, मृत शिशु का जन्म, बर्थ डिफेक्ट, बर्थ इन्जरी एवं नवजात शिशु में ग्लूकोज की कमी के साथ पहले तीन महीने में अचानक गर्भपात की सम्भावना 30 से 60 प्रतिशत तक हो सकती है. सिविल सर्जन ने बताया कि गर्भवती महिला को प्रथम प्रसव पूर्व जाँच के दौरान मधुमेह की जाँच जरूर करानी चाहिए. जिसके लिए जिले के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों एवं जिला अस्पताल में इसकी पूर्ण व्यवस्था करायी गयी है। साथ ही प्रत्येक महीने की नौवीं तारीख को समस्त जिले के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत अन्य जांचों के साथ गर्भवती महिलाओं में मधुमेह की भी निःशुल्क जाँच की जाती है। इसमें गर्भवती महिला को 75 मिलीग्राम ग्लूकोज का एक पैकेट 300 मिलीग्राम पानी में घोल कर पिलाने के 2 घंटे उपरान्त प्लाज्मा ग्लूकोज की जाँच की जाती है। यदि जाँच पॉजिटिव होता है दिशा निर्देशों के अनुसार उपचार की दिशा में कार्य किया जाता है।




