संतोष तिवारी की रिपोर्ट :-
गुरु तेग बहादुर की शहादत का यह दिन हमें उनके बलिदान, त्याग और सहनशीलता की याद दिलाता है, साथ ही जुल्म, अन्याय व अत्याचार के खिलाफ और धर्म की रक्षा के लिए डटकर मुकाबला करने की प्रेरणा देता है।

हिन्दू धर्म की रक्षा करने वाले शहीदों के याद में शहीदी दिवस को लेकर विशाल शहादत यात्रा बिहार के मुजफ्फरपुर शहर में निकाली गई, आइये जानते है शहीदी दिवस क्यूँ और कब से, इसे हिन्द का चादर भी कहते है,
गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस पर उनकी जीवनी और कुछ रोचक बातें
इतिहास में धर्म, सिद्धांत और मानवता की रक्षा के लिए निस्वार्थ बलिदान के कारण हर साल 24 नवम्बर को सिक्खों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी की पुण्यतिथि को ‘शहादत दिवस‘ के रूप में मनाया जाता है। औरंगजेब ने इस्लाम स्वीकार न करने पर चांदनी चौक पर उनका सिर कलम करवा दिया

वैसे तो गुरु तेग बहादुर जी 24 नवंबर 1675 को शहीद हुए लेकिन कुछ इतिहासकारों के मुताबिक वे 11 नवंबर 1675 को शहीद हुए माने जाते हैं। भारत में उनका शहीदी पर्व प्रति वर्ष 24 नवंबर मनाया जाता है।
उनकी शहादत का यह दिन हमें उनके बलिदान, त्याग और सहनशीलता की याद दिलाता है, साथ ही जुल्म, अन्याय व अत्याचार के खिलाफ और धर्म की रक्षा के लिए डटकर मुकाबला करने की प्रेरणा देता है।
श्री गुरु तेग बहादुर का जन्म वैसाख कृष्ण पंचमी (1 अप्रैल 1621) को पंजाब के अमृतसर मुगल सल्तनत में हुआ वह सिक्खों के छठे गुरु गुरु हरगोविंद की 6 संतानों में से एक थे। उनके बचपन का नाम ‘त्याग मल‘ था और उनकी माँ का नाम ‘माता नानकी‘ था।

जब उनका जन्म हुआ तब अमृतसर सिक्खों की आस्था का केंद्र था। उन्हें सिख संस्कृति में तीरंदाजी और घुड़सवारी में प्रशिक्षित किया गया और वेदों उपनिषदों और पुराणों जैसे पुराने क्लासिक्स भी पढ़ाए गए।
श्री गुरू तेग बहादुर का विवाह 3 फरवरी 1633 को ‘माता गुजरी‘ के साथ हुआ। जिनसे उन्हें एक पुत्र श्री गुरु गोविंद राय (सिंह जी) की प्राप्ति हुई जो बाद में सिक्खों के 10वें गुरु बने।
1644 में उनके पिता गुरु हरगोबिंद की मृत्यु नजदीक आने पर गुरु हरगोबिंद अपनी पत्नी नानकी के साथ उनके पैतृक गांव बकाला, अमृतसर (पंजाब) में चले गए, साथ ही त्याग मल और उनकी पत्नी माता गुजरी भी गए।
गुरु हरगोविंद जी की मृत्यु के बाद गुरु तेग बहादुर अपनी पत्नी और मां के साथ बकाला में ही रहते रहे, वह हमेशा से ही लंबे समय तक एकांत और चिंतन के मंत्र को प्राथमिकता देते थे।
हालांकि वे बैरागी नहीं थे उन्होंने अपनी परिवारिक जिम्मेदारियों में हिस्सा लिया और बकाला के बाहर का भी दौरा किया तथा आनंदपुर साहिब नामक नगर बसाया और वहीं रहने लगे।

मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ “करतारपुर की जंग” में मुगल सेना के खिलाफ अतुलनीय पराक्रम दिखाने के बाद उन्हें तेग बहादुर (तलवार के धनी) नाम मिला। इसके बाद सिखों के 8वें गुरु श्री हरिकृष्ण राय जी की अकाल मृत्यु के बाद 16 अप्रैल 1664 को श्री गुरु तेगबहादुर सिखों को नौवें गुरु बने।
कश्मीरी हिंदुओं के जबरन मुश्लिम बनाने पर गुरू जी ने औरंगजेब का विरोध किया और हिंदू धर्म की रक्षा और हिंदु एकता को जगाने के लिए उन्होंने अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया इसलिए आप जी को ‘हिंद की चादर’ (भारत की ढाल) कहा जाता है!
अपनी शहादत से पहले गुरु तेग बहादुर ने 8 जुलाई 1975 को गुरु गोविंद सिंह जी को सिखों का दसवां गुरु नियुक्त कर दिया था। सिक्खों की पवित्र पुस्तक गुरु ग्रंथ साहिब में उनके द्वारा लिखें गए 115 शबद शामिल हैं

गुरु तेग बहादुर की मुगल बादशाह औरंगजेब से सांघातिक विरोध की शुरुआत कश्मीरी पंडितों को लेकर हुई। कश्मीरी पंडित मुगलों द्वारा जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन (हिन्दू से मुस्लिम बनाए जाने) के जुल्म सह रहे थे। सैकड़ों कश्मीरी पंडितों का जत्था पंडित कृपा राम के साथ आनंदपुर साहिब पहुँचा और गुरु तेग बहादुर से अपनी रक्षा की गुहार लगाई।
गुरु तेग बहादुर जी ने कहा कि धर्म की रक्षा के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को बलिदान देना होगा जिसके बलिदान से लोगों की आत्मा जाग जाएं, क्योंकि तभी गुलामी और भय से ग्रस्त ये लोग जाग सकेंगे और अपनी कायरता और डर को भुलाकर अपने धर्म की रक्षा के लिए हँसते-हँसते मौत को गले लगा सकेंगे।
औरंगजेब के हिन्दूओं पर किए जा रहे अत्याचारों और अपने पिता की बात सुन गुरु जी के नौ वर्षीय पुत्र (गुरु गोविंदसिंह) ने कहा कि उनकी नज़र में इस काम के लिए आपसे बेहतर कोई और नहीं हो सकता।

गुरु तेग बहादुर जी ने कश्मीरी पंडितों पर धर्म परिवर्तन के लिए हो रहे औरंगजेब के जुल्मों और हिंदू धर्म की रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान देने का निर्णय लिया। और औरंगजेब तक यह संदेशा पहुंचाने हो कहा कि यदि गुरु तेगबहादुर जी इस्लाम कबूल लेंगे तो वे सब भी इस्लाम स्वीकार लेंगे!
जुलाई 1675 में गुरु तेग बहादुर अपने तीन अन्य शिष्यों के साथ अपने हत्यारे के पास स्वंय चलकर पहुंचे। इतिहासकारों की माने तो गुरु तेग बहादुर को औरंगजेब की फौज ने गिरफ्तार कर लिया था। इसके बाद उन्हें करीब तीन-चार महीने तक कैद कर रखा गया और बाद में पिंजड़े में बंद कर 04 नवंबर 1675 को मुगल सल्तनत की राजधानी दिल्ली लाया गया।
औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर से इस्लाम स्वीकार करने को कहा, तो गुरु साहब ने जवाब दिया:
उन्हें डराने के लिए उनके साथ गिरफ्तार किए गए भाई मति दास के शरीर को आरे से जिन्दा चीर दिया गया, भाई दयाल दास को खौलते हुए पानी में उबाल दिया गया और भाई सति दास को कपास में लपेटकर जिंदा जलवा दिया गया।

इसके बावजूद उन्होंने जब इस्लाम स्वीकार नहीं किया तो आठ दिनों तक यातनाएं देने के बाद मुगल बादशाह औरंगजेब ने दिल्ली के चांदनी चौक पर भीड़ के सामने गुरु तेग बहादुर जी का सर कटवा दिया था!
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