गांव से लौटकर दादा ठाकुर
देश की अगर राजनीति की बात करेंगे तो बिना किसान के कोई भी राजनीति नहीं होता। भले किसान समृद्ध होने का सभी राजनीतिक दल आगे आकर अपनी बेतहाशा बयानबाजी से लोगों को सम्मोहित कर ले लेकिन इन किसानों की आज भी मुकद्दर जस की तस है। सरकार कितनी बदल गई लेकिन नहीं बदली तो किसानों की किस्मत। हां कृषि अधिकारी जरूर रातों-रात धनकुबेर बन गए किसान कार्यालय के नाम पर अब जरा मामले को समझें हर आवेदन के लिए अब ओटीपी महत्वपूर्ण कर दिया गया है। अब ऐसे में अधिकारियों के बिचौलिए के साथ इतनी जबरदस्त पकड़ है। जहां जनता जनार्दन की शायद पहुंच तक नहीं। लाजमी है बाबू के अनुसार ओटीपी दिया जाता है। ऐसे में दलाल कई ऐसे फर्जी किसानों के लिस्ट ओटीपी और पैसे लेकर सीधे किसान कार्यालय पहुंचते हैं। जहां धान की बीज गेहूं की बीज या किसी फसल की बीज हो या खाद। हर हाल में बिचौलिए के जरिए ही अधिकारी उन्हें आम जनमानस तक पहुंचाएंगे। दरअसल अगर धरातल पर आप उतर कर देखेंगे ऐसी एक योजना की शिकायत आपको नहीं मिलेगे बल्कि सरकारी कई ऐसी योजनाएं हैं जहां भ्रष्टाचार की गंगोत्री में सभी डुबकी लगाने को आतुर है। यहां अधिकारियों और प्रतिनिधियों के बीच इतनी अच्छी सामंजस बैठी हुई है। यदि इन पर कोई जांच की आंच आ भी जाए इनको कई राजनीतिक आकाओं का भी बरदहसत र्होता है। हालांकि अधिकारी जांच के नाम पर जरूर पहुंच जाते हैं।लेकिन उनकी भी मजबूरी शायद सत्तासीन सरकार से सीधी दुश्मनी क्यों, ईमानदार अधिकारी का भी मन टटोल कर रह जाता है। बरहाल नेतागिरी अब सेवा नहीं एक पेशा हो गया है। जीते तो 100 के हिसाब से वसूली, नहीं तो हारे को हरिनाम, बाकी साहेब का पीसी सेट है।




