कुलपतियों पर उठे सवाल, एक पर करोड़ों के होटल खरीदने का आरोप तो दूसरे पर कार्यकाल बाद भी पद पर रहने की चर्चा!

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रिपोर्ट – आशुतोष पांडेय!

विश्वविद्यालयों में कुलपतियों को लेकर उठे सवाल, एक पर करोड़ों के होटल खरीदने का आरोप तो दूसरे के कार्यकाल बाद भी पद पर बने रहने की चर्चा

आरा। बिहार के विश्वविद्यालयों की व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर इन दिनों एक बातचीत सामाजिक माध्यमों पर चर्चा का विषय बनी हुई है। बातचीत में पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. उपेन्द्र प्रसाद सिंह से जुड़े कथित संपत्ति संबंधी आरोप से लेकर वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शैलेन्द्र कुमार चतुर्वेदी के कार्यकाल के बाद भी पद पर बने रहने को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. उपेन्द्र प्रसाद सिंह को लेकर वायरल बातचीत में दावा किया गया है कि उन्होंने करोड़ों रुपये का एक आलीशान होटल खरीदा है। इसके साथ ही यह सवाल उठाया गया है कि इतनी बड़ी संपत्ति खरीदने के लिए धन कहां से आया। हालांकि, उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी की पड़ताल में अब तक ऐसा कोई विश्वसनीय आधिकारिक दस्तावेज, प्राथमिकी, निगरानी विभाग या आर्थिक अपराध इकाई की कार्रवाई, न्यायालय का निष्कर्ष अथवा संपत्ति संबंधी प्रमाण सामने नहीं आया है, जिससे इस आरोप को प्रमाणित तथ्य माना जा सके।

ऐसे में इस दावे को फिलहाल केवल आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। यदि आरोप गंभीर हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच और तथ्यों का सार्वजनिक होना भी जरूरी है। प्रो. उपेन्द्र प्रसाद सिंह को जुलाई 2025 में तीन वर्ष के कार्यकाल के लिए पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया था। वहीं, विश्वविद्यालय में वेतन, पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों में देरी जैसे मुद्दों को लेकर शिक्षकों की ओर से विरोध की खबरें भी सामने आती रही हैं।

वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय में कार्यकाल को लेकर सवाल

वायरल बातचीत में वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के कुलपति प्रो. शैलेन्द्र कुमार चतुर्वेदी को लेकर भी सवाल उठाया गया है कि निर्धारित कार्यकाल पूरा होने के बाद भी वे पद पर क्यों बने हुए हैं और नए कुलपति की नियुक्ति में देरी क्यों हो रही है।

यह मामला अपेक्षाकृत अधिक दस्तावेजी आधार वाला है। कुलपति का निर्धारित कार्यकाल पूरा होने के बाद नई नियुक्ति होने तक उनके पद पर बने रहने को लेकर मामला न्यायालय तक पहुंचा। इसी बीच बिहार के राजभवन की ओर से पूर्व में जारी कुलपति चयन संबंधी विज्ञापनों को रद्द कर नई चयन प्रक्रिया शुरू किए जाने की जानकारी भी सामने आई।

पारदर्शिता और जवाबदेही पर उठ रहे सवाल

कुलपति का पद किसी विश्वविद्यालय में केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी तक सीमित नहीं होता। विश्वविद्यालय का करोड़ों रुपये का बजट, नियुक्तियां, निर्माण कार्य, खरीद प्रक्रिया, शैक्षणिक व्यवस्था और हजारों विद्यार्थियों का भविष्य इससे जुड़ा होता है। ऐसे में कुलपति की नियुक्ति, कार्यकाल, वित्तीय निर्णय और प्रशासनिक जवाबदेही में पारदर्शिता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

जानकारों के अनुसार, किसी भी पदाधिकारी पर गंभीर आरोप लगने की स्थिति में न तो बिना प्रमाण आरोपों को सच माना जाना चाहिए और न ही गंभीर आरोपों की अनदेखी की जानी चाहिए। निष्पक्ष जांच के बाद तथ्यों को सामने रखना ही विश्वविद्यालयी व्यवस्था में लोगों का विश्वास कायम रखने का सबसे बेहतर तरीका हो सकता है।

अब सवाल यह भी उठ रहा है कि जब विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को लेकर इस तरह के गंभीर आरोप और सवाल सार्वजनिक मंचों पर सामने आते हैं, तो क्या राजभवन अथवा संबंधित विश्वविद्यालय प्रशासन को तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए?

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