रिपोर्ट :- संतोष चौहान!
सुपौल :- जिले के पिपरा प्रखंड में लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत वार रूम कर्मी की बहाली को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। प्रखंड विकास पदाधिकारी अमरेन्द्र पंडित द्वारा नियुक्ति पत्र जारी करने और अभ्यर्थी से कार्यभार ग्रहण कराने के महज दस दिन बाद ही उसी बहाली को स्थगित कर दिए जाने से प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। मामले को लेकर प्रखंड क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं, जबकि पीड़ित अभ्यर्थी ने इसे पूरी तरह मनमानी बताते हुए उच्च अधिकारियों से न्याय की गुहार लगाने की बात कही है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति (बीआरएलपीएस), ग्रामीण विकास विभाग, पटना के निर्देशानुसार तथा उप विकास आयुक्त, सुपौल के आदेश के आलोक में पिपरा प्रखंड स्वच्छता कार्यालय में वार रूम कर्मी की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की गई थी। इसके तहत 24 जून से 29 जून 2026 तक आवेदन आमंत्रित किए गए और इसकी सूचना प्रखंड कार्यालय के सूचना पट पर भी चिपका दी गई।
निर्धारित अवधि में प्राप्त आवेदनों की जांच के बाद प्रखंड कार्यालय के ज्ञापांक 821, दिनांक 1 जुलाई 2026 के माध्यम से दीना पट्टी पंचायत निवासी संतोष कुमार पासवान का चयन किया गया। बीडीओ अमरेन्द्र पंडित ने स्वयं उन्हें नियुक्ति पत्र सौंपा और कार्यभार ग्रहण कराया। संतोष कुमार के अनुसार, वह 1 जुलाई से नियमित रूप से स्वच्छता कार्यालय पहुंचकर अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे थे।
हालांकि, नियुक्ति के महज 10 दिन बाद पूरे मामले ने अचानक नया मोड़ ले लिया। बीडीओ कार्यालय से ज्ञापांक 891, दिनांक 11 जुलाई 2026 जारी कर उक्त बहाली को स्थगित कर दिया गया। आदेश में कहा गया कि बहाली प्रक्रिया नियमानुसार नहीं हुई थी, इसलिए नए सिरे से आवेदन लेकर पूरी प्रक्रिया दोबारा कराई जाएगी।
इस आदेश के बाद नियुक्त अभ्यर्थी संतोष कुमार पासवान ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उन्हें विधिवत नियुक्ति पत्र दिया गया, कार्यालय बुलाकर कार्य भी कराया गया, लेकिन हाजिरी रजिस्टर पर हस्ताक्षर नहीं करने दिए गए। पूछने पर बताया गया कि हाजिरी पंजी पर बीडीओ साहब के हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। इसके बाद अचानक उन्हें सेवा से हटा दिया गया।
संतोष कुमार ने आरोप लगाया कि बिना कोई कारण बताए और बिना किसी प्रकार का स्पष्टीकरण मांगे उन्हें नौकरी से बाहर कर दिया गया। उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह अन्यायपूर्ण और मनमाना फैसला है। उनका आरोप है कि उन्होंने बीडीओ की “महत्वाकांक्षा” पूरी नहीं की, जिसकी वजह से उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। उन्होंने कहा कि एक गरीब युवक के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया गया है। अब वह जिला पदाधिकारी सहित सभी सक्षम अधिकारियों के समक्ष लिखित शिकायत देकर न्याय की मांग करेंगे और जरूरत पड़ी तो न्यायालय की भी शरण लेंगे।
दूसरी ओर, जब इस संबंध में बीडीओ अमरेन्द्र पंडित से बात की गई तो उन्होंने स्वीकार किया कि बहाली प्रक्रिया दोबारा कराई जाएगी। उन्होंने कहा कि नियुक्ति पत्र जारी करते समय नियमावली का समुचित अध्ययन नहीं किया गया था। इसी कारण पूर्व की प्रक्रिया को स्थगित कर नए सिरे से बहाली कराने का निर्णय लिया गया है।
बीडीओ के इस बयान के बाद मामला और अधिक चर्चा का विषय बन गया है। सवाल यह उठ रहा है कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया नियमों के अनुरूप नहीं थी तो नियुक्ति पत्र जारी करने से पहले उसकी जांच क्यों नहीं की गई। वहीं यदि नियुक्ति पत्र जारी कर अभ्यर्थी से कार्य भी लिया गया, तो बिना किसी विभागीय जांच, नोटिस या सुनवाई के उसे सेवा से हटाना क्या प्रशासनिक नियमों के अनुरूप है।
प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि सरकारी नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और नियमों का पालन सर्वोपरि होता है। यदि किसी स्तर पर प्रक्रिया में त्रुटि हुई है तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। वहीं नियुक्त अभ्यर्थी के अधिकारों की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। ऐसे मामलों में संबंधित अभ्यर्थी को अपना पक्ष रखने का अवसर देना और नियमानुसार कार्रवाई करना आवश्यक माना जाता है।
इधर, पूरे मामले को लेकर स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों में भी नाराजगी देखी जा रही है। लोगों का कहना है कि सरकारी नौकरियों को लेकर पहले ही युवाओं में भारी प्रतिस्पर्धा है। ऐसे में नियुक्ति देकर कुछ दिनों बाद वापस लेना युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। उनका कहना है कि यदि अधिकारियों की लापरवाही या नियमों की जानकारी के अभाव में यह स्थिति उत्पन्न हुई है तो इसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि नियुक्ति प्रक्रिया में आखिर किस स्तर पर चूक हुई है और इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं। साथ ही पीड़ित अभ्यर्थी को न्याय दिलाने तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए आवश्यक कार्रवाई किए जाने की भी मांग उठ रही है। फिलहाल पिपरा प्रखंड में यह मामला चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है और सभी की नजर जिला प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी है।




