सुपौल में मिलीं 600 वर्ष पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियाँ, देश की एकमात्र हस्तलिखित ‘भृगुसंहिता’ भी मौजूद!

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रिपोर्ट :- संतोष चौहान!

सुपौल :- बिहार का सुपौल जिला एक बार फिर देश के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मानचित्र पर अपनी समृद्ध विरासत के लिए चमक उठा है। जहां सुपौल जिले के राघोपुर प्रखंड अंतर्गत त्रिलोकधाम गोसपुर ग्राम में 15वीं सदी का अत्यंत दुर्लभ काव्य अलंकार ग्रंथ “कुवलयानंद” और पूरे भारतवर्ष में एकमात्र उपलब्ध हस्तलिखित “भृगुसंहिता” मिलने से देश के बुद्धिजीवियों, शोधकर्ताओं और इतिहासकारों में हर्ष का माहौल है।
इस ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व की धरोहर की जानकारी मिलते ही सुपौल के जिलाधिकारी सावन कुमार एवं सुपौल पुलिस अधीक्षक, सुपौल शरथ आर० एस० ने स्वयं गोसपुर ग्राम पहुंचकर इन दुर्लभ पांडुलिपियों का गहन अवलोकन किया।

600 वर्ष प्राचीन ज्ञान का जीवंत उदाहरण
प्रशासनिक अधिकारियों के निरीक्षण के दौरान यह बात सामने आई कि लगभग 600 वर्ष पुरानी ये पांडुलिपियाँ संस्कृत, हिंदी और मिथिलाक्षर लिपियों में लिखित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज इस बात का साक्षात प्रमाण है कि सुपौल जिला और संपूर्ण मिथिलांचल सदियों से बौद्धिक उन्नति, व्याकरण, न्याय और उच्च कोटि की ज्ञान परंपरा का मुख्य केंद्र रहा है।

राजपंडित त्रिलोकनाथ मिश्रा के परिवार ने सहेजी अमूल्य विरासत

यह अद्वितीय खोज भारत के महान विद्वान एवं दरभंगा महाराज श्री कामेश्वर सिंह के राज पंडित रहे त्रिलोकनाथ मिश्रा जी की समृद्ध ज्ञान परंपरा की देन है। उनके पौत्र पंडित शचींद्रनाथ मिश्रा एवं प्रपौत्र आचार्य श्री धर्मेंद्रनाथ मिश्रा ने इन अत्यंत संवेदनशील और प्राचीन पांडुलिपियों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी बेहद सहेज कर रखा। उन्होंने न केवल जिले की, बल्कि संपूर्ण भारत वर्ष की इस दुर्लभ ज्ञान विरासत को लुप्त होने से बचाया है।

विद्वानों ने जताया आभार:
संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार तथा कला एवं संस्कृति विभाग बिहार सरकार द्वारा संचालित ज्ञान भारतम् मिशन के महान उद्देश्यों की सफलता में सुपौल जिले के इस अभूतपूर्व योगदान और प्रशासनिक तत्परता के लिए जिले के समस्त विद्वानों, बुद्धिजीवियों और सनातन संस्कृति के जानकारों ने जिलाधिकारी सावन कुमार एवं पुलिस अधीक्षक सुपौल का सहृदय धन्यवाद ज्ञापित किया है।

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