रचना – डॉ अनमोल कुमार
ऊँचे शिखर से कूद पड़ा वो मतवाला,
चट्टानों से टकराता, गाता गीत निराला।
मोतियों-सा बिखरता, चाँदी-सा चमकता,
धूप से खेलता, इंद्रधनुष रचता।
नाम है उसका झरना, पहाड़ों की संतान,
अविरल बहता, देता सबको जीवनदान।
न थकता, न रुकता, न सोता कभी,
सदियों से कहता अपनी कहानी सभी।
प्यासे पंछी आते, हिरन यहाँ नहाते,
साधु की समाधि, बच्चे यहाँ नाचते-गाते।
शोर में भी संगीत है, वेग में भी शांति,
झरना सिखाता है – बहते रहना ही क्रांति।
कभी-कभी सोचूँ मैं मन की बात,
हमारा जीवन भी तो है झरने के साथ।
राह में चट्टानें आएँ लाख,
रुकना नहीं, झुकना नहीं, बनाना नई राह।
गिरकर भी उठना, बिखरकर भी सँवरना,
यही तो सिखाता है पागल सा झरना।
शहर के शोर से जब मन घबराए,
कंक्रीट के जंगल जब साँस उलझाए,
चला जाऊँ मैं उस झरने के पास,
जहाँ बूँद-बूँद में बसे विश्वास।
ठंडे छींटे जब माथे को छुएँ,
सारी चिंता, सारा तनाव धुएँ।
झरना कहता है – “बहो, बस बहते जाओ,
कीचड़ में भी कमल सा खिलते जाओ।
मैं गिरता हूँ ऊँचाई से, पर हार नहीं मानता,
तुम भी गिरो तो क्या, फिर से आसमान छू लेना।”
_”पहाड़ रोया नहीं, मुस्कुराया था,
तभी तो झरना बनकर धरती पर आया था।




