दरभंगा संवाददाता:- लक्ष्मण कुमार
तीन महीने बीते, न जांच न कार्रवाई, सवालों में शिक्षा विभाग प्राथमिक विद्यालय में नियमों की अनदेखी का मामला उजागर।
मृत्यु के बहाने छुट्टी, बच्चे घर भेजे गए, फाइलों में परोसा गया भोजन, तीन माह बाद भी जांच ठंडे बस्ते में।
एमडीएम विवाद में उलझा स्कूल, शिक्षा विभाग की भूमिका संदिग्ध।
लक्ष्मण कुमार ।
दरभंगा जिले के बहादुरपुर प्रखंड अंतर्गत प्राथमिक विद्यालय एकमीघाट, बल्लोपुर में सामने आया एक मामला अब शिक्षा विभाग की कार्यशैली, जवाबदेही और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। विद्यालय में कथित तौर पर गांव में एक व्यक्ति की मृत्यु का हवाला देकर बच्चों को समय से पहले छुट्टी दे दी गई, जबकि विभागीय अभिलेखों में उसी दिन मध्याह्न भोजन (एमडीएम) संचालित दिखाया गया। इस विरोधाभास ने न केवल नियमों के उल्लंघन की आशंका को जन्म दिया है, बल्कि संभावित वित्तीय अनियमितता की ओर भी इशारा किया है।
यह मामला 29 सितंबर 2025 को मीडिया में सामने आया था। खबर प्रकाशित होने के बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि शिक्षा विभाग त्वरित संज्ञान लेते हुए विद्यालय का भौतिक निरीक्षण कराएगा और निष्पक्ष जांच के माध्यम से स्थिति स्पष्ट करेगा। लेकिन तीन महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद न तो विद्यालय का स्थल निरीक्षण किया गया और न ही किसी ठोस जांच की प्रक्रिया शुरू हो सकी। यह देरी अब सवालों के घेरे में है।
खबर प्रकाशित होने के कुछ ही दिनों बाद 4 अक्टूबर 2025 को प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी (बीईओ), बहादुरपुर द्वारा विद्यालय के प्रधानाध्यापक से स्पष्टीकरण मांगा गया। प्रधानाध्यापक ने 11 अक्टूबर 2025 को दिए अपने लिखित जवाब में मीडिया रिपोर्ट को भ्रामक बताते हुए कहा कि 28 सितंबर 2025 को गांव में एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई थी। ग्रामीणों के अनुरोध पर बच्चों को मध्याह्न भोजन कराने के बाद 12 बजकर 50 मिनट पर छुट्टी दे दी गई थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि शिक्षक उस समय मूल्यांकन संबंधी शैक्षणिक कार्यों में संलग्न थे और उनकी भूमिका को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया।
हालांकि, मामला यहीं खत्म नहीं होता। विद्यालय में कार्यरत रसोईया का बयान प्रधानाध्यापक के दावे से मेल नहीं खाता। रसोईया के अनुसार, उस दिन गांव में शादी समारोह था और इसी कारण बच्चों को छुट्टी दी गई। उनका यह भी कहना है कि मध्याह्न भोजन नहीं बनाया गया। इन दोनों बयानों के बीच का अंतर पूरे प्रकरण को और संदिग्ध बना देता है।
सूत्रों के मुताबिक, विभागीय रिकॉर्ड में 28 सितंबर 2025 को मध्याह्न भोजन चालू दर्शाया गया है। यदि वास्तव में बच्चों को भोजन कराया गया था, तो इसकी पुष्टि रसोई पंजी, खाद्यान्न उपयोग, उपस्थिति पंजी और शिक्षकों की हाजिरी से होनी चाहिए। लेकिन अब तक इन अभिलेखों की जांच नहीं की गई है। यही नहीं, उस दिन विद्यालय में कितने शिक्षक उपस्थित थे, कितने अनुपस्थित रहे, और किस आधार पर छुट्टी दी गई—इन सवालों के भी स्पष्ट जवाब नहीं मिल पाए हैं।
बीईओ बहादुरपुर ने 3 नवंबर 2025 को इस पूरे मामले को जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (स्थापना), दरभंगा को अग्रसारित कर दिया। इसके बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि जिला स्तर से स्वतंत्र जांच कराई जाएगी। लेकिन लगभग तीन महीने गुजर जाने के बाद भी न तो जांच टीम गठित की गई और न ही किसी अधिकारी ने विद्यालय का निरीक्षण किया।
शिक्षा विभाग के नियम स्पष्ट हैं कि विद्यालय में आकस्मिक छुट्टी, विशेषकर मध्याह्न भोजन से संबंधित मामलों में, निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन अनिवार्य है। किसी सामाजिक या पारिवारिक घटना के आधार पर विद्यालय बंद करना या बच्चों को छुट्टी देना तभी संभव है जब इसके लिए सक्षम प्राधिकारी से अनुमति ली गई हो। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मृत्यु के हवाले से दी गई छुट्टी विभागीय निर्देशों के अनुरूप थी। और यदि नहीं, तो अब तक जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
स्थानीय लोगों और शिक्षा से जुड़े संगठनों का कहना है कि यदि इस मामले में समय रहते जांच नहीं की गई, तो इससे गलत परंपरा को बढ़ावा मिलेगा। उनकी मांग है कि जिला स्तर से एक स्वतंत्र जांच टीम गठित कर विद्यालय का तत्काल निरीक्षण कराया जाए, सभी संबंधित अभिलेख—हाजिरी पंजी, रसोई पंजी, एमडीएम स्टॉक रजिस्टर—की गहन जांच हो और दोष पाए जाने पर सख्त विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
इस संबंध में पक्ष जानने के लिए प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी। वहीं जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (स्थापना) ने कहा कि मामला उनके संज्ञान में है और जांच के बाद दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी।
फिलहाल, जांच की प्रतीक्षा में यह मामला शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर खड़ा है। अब देखने वाली बात यह होगी कि जिम्मेदार अधिकारी कब तक कागजी कार्रवाई से आगे बढ़कर जमीनी सच्चाई की जांच करते हैं और क्या बच्चों के हित से जुड़े इस मामले में पारदर्शी निर्णय सामने आ पाता है या नहीं।




