15 दिवसीय नाट्य कार्यशाला के उपरांत हुई नाटक प्रस्तुति!

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भागलपुर से धीरज शर्मा की रिपोर्ट

आजादी के 75 वाॅ वर्षगांठ अमृत महोत्सव के अवसर पर पूर्वी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र कोलकाता संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग से रंगग्राम जन सांस्कृतिक मंच भागलपुर एवं कलासागर सांस्कृतिक संगठन भागलपुर के आयोजन में दिनांक 21 सितंबर 2021 से 5 अक्टूबर 2021तक चले नाट्य कार्यशाला के उपरांत कार्यशाला में भाग लिये प्रतिभागियों के द्वारा नवयुग विद्यालय, भागलपुर के प्रांगण में कार्यशाला समूह के द्वारा तैयार नाट्य आलेख “कथा एक गांव की” यहां कार्यशाला में अलग-अलग विषय विशेषज्ञों द्वारा रंगकर्म से संबंधित जानकारियां बारीक तकनीकी ओं से रूबरू कराया गया नाटक आलेख के लिए जेपी शर्मा उनके सहायक कपिल देव रंग अभिनय के लिए डॉक्टर चैतन्य प्रकाश उनके सहायक के रूप में मिथिलेश कुमार निर्देशन के विशेषज्ञ के रूप में अजय कुमार राय उर्फ अजय अटल मंच सज्जा एवं रूप सज्जा के लिए मनोज कुमार पंडित सज्जन कुमार सिंह सहायक के रूप में प्रकाश प्रारूपन के लिए ऋषिकेश लाल जो कि रांची से चलकर आए थे। इन सबों के द्वारा इस कार्यशाला को कार्यशाला में उपस्थित प्रतिभागियों को प्रशिक्षित कराया गया। प्रतिभागी के रूप में प्रीतम कुमार, राकेश कुमार सिंह, प्रियांशु झा, सूरज कुमार ,आशीष कुमार, लक्ष्मण बिहारी, मनोज कुमार मंडल, पंकज कुमार, मनोज कुमार, विकास कुमार, आशीष कुमार, अनुराधा गीते, अमन सागर, प्रणव कुमार, गौतम कुमार, पूर्णेन्दु कुमार, प्रकाश मंडल, मनीषा कुमारी, रीना कुमारी, ज्योति कुमारी, सिटी, प्रिया कुमारी, तनुजा कुमारी, अमृत आनंद, आदित्य आनंद , डॉ मनजीत कुमार सिंह ,हर्षवर्धन ,कृष्णा, आदर्श अग्निहोत्री, प्रीति कुमारी, ब्रिज भूषण कुमार, कोमल तिवारी, अर्चना कुमारी, अंशु प्रज्ञान, और मदन कुमार शामिल हुए। इन सभी प्रतिभागियों के द्वारा ही कार्यशाला के समापन के उपरांत प्रस्तुति दी गई। इस नाटक का निर्देशन डॉ मंजीत सिंह ने किया है।

नाटक की कथावस्तु कुछ इस प्रकार है अंधविश्वास पर चोट करते हुए यह नाटक “कथा एक गांव की” एक ऐसे गांव की जीवन तस्वीर प्रस्तुत करता है जहां और अंधविश्वास बाल विवाह बेमेल विवाह और शिक्षा नारी शोषण जैसी विसंगतियों विसंगतियां फल-फूल रही है। कथा कुछ इस प्रकार है कि इस गांव का एक युवक मनवा शादी करके दुल्हन को घर लाता है घर में प्रवेश करते ही दुल्हन बेहोश हो जाती है बेहोशी दूर करने के लिए तांत्रिक को बुलाकर उपक्रम करवाया जा रहा होता है किताबी कथा नायक दिवाकर आकर उसे पानी के छींटे मात्र से होश में लाकर ग्रामीणों को अंधविश्वास से दूर रहने की सलाह देता है दिवाकर समाज का एक पढ़ा-लिखा नौजवान है जो समाज की विसंगतियों को दूर करने के लिए हमेशा तत्पर रहता है नाटक की कथा में एक ऐसी घटना भी आती है एक शराबी पति नशे की लत में ना सिर्फ अपनी पत्नी को प्रताड़ित करता है बल्कि पैसे मिलने के लोग में अपनी कम उम्र की बेटी रजिया के हाथों में सौंपने का शहर तैयार हो जाता है जमा कर इस बात का पता चलता है तोड़ दिया की मदद करता है और उसकी शादी को रुक जाता है की गतिविधि को देखकर गांव के कुछ लोग दिवाकर पर लगाता है परंतु दिवाकर इस सबकी परवाह न करते हुए अपने कर्म पर आता है कर्म पथ पर आता है।

किसी गांव में बिगड़ैल युवकों की ताज चौकड़ी भी लगती है जहां सुनी सुनाई कथाओं की चर्चा होती रहती है जिसमें अक्सर एक भुतहा पेड़ का जिक्र होता है दिवाकर किसी भी प्रकार के भुतहा पर होने की बात मानने से इंकार कर देता है इसे साबित करने के लिए दिवाकर को अपनी जान की बाजी लगानी पड़ जाती है गांव को गांव वालों को दिवाकर की बात पर माननी ही पड़ती है इस प्रकार अपने समाज में फैली विसंगतियों को दूर करने के लिए एक युवक अंता समाज में फैली विसंगतियों को दूर करने में सफल होता है एक मुख्य कथा के साथ कई कथाएं शामिल है जिसे आगे बढ़ाने में कई पात्रों की भूमिका है लड़की दिवाकर के प्रति विशेष सहानुभूति रखती है उसके दिवाकर के प्रति विशेष सहानुभूति का पता अंत तक पहुंच कर चलता है अंत में कहा जा सकता है तथा 1 गांव की किसी एक विशेष गांव की कथा ना होकर सारे गांव की कथा है जहां अंधविश्वास बाल विवाह बेमेल विवाह नारी प्रताड़ना दी आदि अभी तक जमा हुए ऐसे में यह तो कहा ही जा सकता है प्रत्येक गांव को दिवाकर जैसे एक नायक की जरूरत है।

प्रस्तुत नाटक के निर्देशक डॉ मंजीत सिंह किनवार का कहना है कि उनका इस नाटक को प्रदर्शित करना निर्देशित कराना बहुत ही यादगार एवं अविस्मरणीय कार्य बिल्कुल नवोदित रंगकर्मी के उत्साह और लगन से इससे मंचन के लिए तैयार किया जा सका इस नाटक के बारे में बात करते हुए डॉक्टर सिंह कहते हैं कि इस नाटक में पात्रों की संख्या बहुत अधिक है लेकिन छात्रों की अधिकता के बावजूद भी कहीं से भी दर्शकों के लिए या फिर कथा के लिए या उलझा पैदा नहीं करता बल्कि साफ-साफ कथा को आगे बढ़ाने में मदद ही करता है सामान्यता संवाद छोटे-छोटे और सुनते हैं, जिसकी वजह से संप्रेषण इयत्ता खुलकर सामने आई है कुल मिलाकर अपने द्वारा निर्देशित नाटक के प्रति डॉक्टर सिंह काफी उत्साहित दिखे।

इस नाटक में सूत्रधार की भूमिका में प्रीतम कुमार गुप्ता की भूमिका में अमन सागर दिवाकर के किरदार को आनंद शेखर हरखू के किरदार को हर्षवर्धन लखना के किरदार को आदित्य नंदा नदिया के किरदार को प्रज्ञा भारती सुरजा के किरदार को सूरज कुमार विशु के किरदार को बृज भूषण कुमार पूर्णा के किरदार को पूर्ण इंदु कुमार फुलवा के किरदार को लक्षण बिहारी मुर्गी किरदार को डॉ मनजीत कुमार सिंह बटेश्वर के किरदार को आशीष कुमार ससुर के किरदार को अमृतानंद भगत के किरदार को अग्निहोत्री ग्रामीण के किरदार में पंकज कुमार प्रणव कुमार मनोज कुमार अंशु प्रज्ञा मदन कुमार प्रकाश मंडल रीना कुमारी अनुराधा गीते रतिया के किरदार में प्रज्ञा भारती मनवा के किरदार में आशीष कुमार एवं बहू के किरदार में सिटी प्रिया कुमारी के साथ-साथ कई अन्य कलाकारों ने अपनी अपनी भूमिका निभाई।

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