रचना – अनमोल कुमार !
फिर भी वो वन चला गया
एक वचन की लाज रखने
भाई के सर ताज रखने
माँ की ममता छोड़ कर के
सारे बंधन तोड़ कर के
अब कहानी की तरह कहना सरल है,
सत्य किंतु जानते हैं हम सभी
निष्काम रहना कितना कठिन है
राम पर लिखना कठिन है
न लालसा वैभव की उनको
थी न सत्ता की पिपासा
रखा ठोकर पे सिंहासन
और पिता को दी दिलासा
जानते थे वे प्रभु हैं
और वैभव सारे लघु हैं
किंतु सोचो तुम तनिक ये
अवतार ले कर मानवों में
आम रहना कितना कठिन है
राम पर लिखना कठिन है




