शरीर और जीवन का संयुक्त बोध जब मानव को हो जाएगा,तो मै कौन हूँ समझ जाएगा – आचार्य नवीन!

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रिपोर्ट अनमोल कुमार

गया। गुरु वन्दना, पिता महेश्वर के सभा कक्ष में आचार्य नवीन ने कहा कि सुखी जीवन का आधार साधन,संबंध और समझ है।भौतिक वस्तुएं हमारी शरीर पोषण ,संरक्षण के लिए है । संबंध का ज्ञान, तृप्ति पूर्वक अपने बंधु बांधव के साथ जीने के लिए और इन दोनो के लिए समझ (ज्ञान) सबसे ज्यादा जरूरी है।

यह बातें उन्होंने जीवन विद्या शिविर के दौरान कही।
श्री नवीन ने कहा कि सेवा का मतलब परस्परता में सहायता तन ,मन, धन से किया गया पूरकता है।

आज इस धरती पर सारे गलती और अपराध के मूल में शरीर को जीवन मानकर जीना है। जबकि मानव शरीर और जीवन का संयुक्त साकार रूप है। आज मानव पशुवत जी रहा है क्योंकि वह शरीर बोध में जीता है। शरीर और जीवन बोध में जीना अभी शेष है।
उन्होंने कहा कि आचरण प्रमाण ही तृप्ति पूर्वक जीने का आधार है।
अस्तित्व में हर इकाई अपने आचरण में है।मानव में भी आचरण में होने का प्यास है, और यह शिक्षा पूर्वक ही संभव हो सकता है। आचरण पूर्णता के लिए मानव जाति को मध्यस्थ दर्शन (जीवन विद्या) का प्रस्ताव है।

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