मजदूर दिवस पर बिशेष जैसे रेल ओझल हो जाती है…

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रचना – अनमोल कुमार

मजदूर
रोटी की तलाश में
कोसों दूर गया था

जब रोटी मिलने की उम्मीद खत्म हो गई
वह पैदल ही चल पड़ा
अपने गांव की ओर

सोचा
सड़क से जाऊंगा
तो रोक लिया जाऊंगा
उसने रेल की पटरियों को चुना

चलते चलते जब वह थक गया
आंखों और पांवों ने जवाब दे दिया
तब उसने उन्हीं पटरियो को तकिया बनाया
और लेट गया अपने साथियों के साथ
उसने सुना था रेलें बसें सब बंद हैं
बेफिक्र सो गया

वे सोलह थे
जब सुबह हुई
तब कोई नहीं बचा था
सिवाय उन रोटियों के
जिन्हें उन्होंने बचाकर रखा था
रास्ते में खाने के लिए

मजदूर अब जा चुके हैं
बहुत दूर
भूख से
इस दुनिया से

जैसे रेल देखते देखते ओझल हो जाती है
उसी तरह अब वे भी जा चुके हैं

उनकी भूख
वापस लौटने की उम्मीद
कुचली जा चुकी है

अब बस उनकी ठंडी देह पड़ी है
उन्हीं पटरियों पर
जहां फिर ट्रेन लौटकर आयेगी
मजदूर अब वापस कभी नहीं आयेंगे
वे जा चुके हैं
बहुत दूर

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