ब्यूरो रिपोर्ट शंखनाद!
मुजफ्फरपुर
संतोष तिवारी की नजरो में वैशाली का हाल शुरू से लेकर अब तक… 6 ठे चरण में होने वाले वैशाली लोकसभा चुनाव में मोदी के मुद्दों के साथ चिराग के प्रति मतदाताओं की दीवानगी चलेगी या फिर मुन्ना का वादा और तेजस्वी का भरोसा और विश्वास आइये देखते हैं कैसे लोकतंत्र के प्रथम जननी वैशाली जो पूरे विश्व को लोकतंत्र का रास्ता दिखाया उसी लोकतंत्र की जननी पर जातीय जटिल और कुंठित बनाने की कोशिश में खूब घोले जा रहे जातीय उन्माद का जहर जो लोकतंत्र के लिए घातक ही नही बल्कि बहुत ही खतरनाक मोड़ पर पहुँचाने का अथक प्रयास किया जा रहा हो वैसे लोकतंत्र की जननी का मतदाता अभी खामोश और साइलेंट होकर चुपचाप बैठ नेताओं की नौटंकी देखने को आतुर है जिससे उसका मनोरंजन के साथ साथ आने वाले भविष्य के नीति निर्माण कार्यताओँ को देश के सबसे उच्च सदन में भेजने का मुहर लगा सके … आजादी के बाद से इस क्षेत्र से कइयों को यहाँ की जनता के अपने मांथे पर बिठाने का काम किया लेकिन किसी ने वैशाली के विकास का कोई खांका तक नही खिंच पाया … अब सबसे पहले आपको इस वैशाली सीट को लेकर चल रहे भावनाओं में वैशाली को लेकर बताते चलें कि भगवान महावीर की जन्मस्थली और भगवान बुद्ध की कर्मभूमि वैशाली का ऐतिहासिक महत्व है। यह जैन मतावलंबियों के लिए पवित्र नगरी है। भगवान बुद्ध का इस धरती पर तीन बार आगमन हुआ था। यह क्षेत्र राष्ट्रीय स्तर के कई संस्थानों तथा केला, आम और लीची के उत्पादन के लिए जाना जाता है। इस सीट का अस्तित्व 1971 में गठित परिसीमन समिति की रिपोर्ट के बाद 1977 में आया। वैशाली क्षेत्र का कुछ हिस्सा हाजीपुर संसदीय सीट में चला गया। मुजफ्फरपुर जिले के पांच विधानसभा क्षेत्रों और वैशाली विधानसभा को मिलाकर इस संसदीय सीट का गठन किया गया। अब तक वैशाली संसदीय सीट के लिए हुए चुनावों में सबसे अधिक जनता दल और राजद ने मिलाकर सात बार जीत दर्ज की। जनता पार्टी ने दो, कांग्रेस ने एक, बिहार पीपुल्स पार्टी ने एक और लोजपा ने दो बार जीत दर्ज की थी। दिग्विजय नारायण सिंह, मुख्यमंत्री रहे सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा की पत्नी किशोरी सिन्हा, उषा सिन्हा, शिवशरण सिंह, रघुवंश प्रसाद सिंह इस क्षेत्र के चर्चित नाम हैं। विधानसभा क्षेत्र और डेमोग्राफी वैशाली के अंतर्गत छह विधानसभा क्षेत्र हैं। ये हैं-वैशाली, कांटी, मीनापुर, बरूराज, साहेबगंज और पारू। वैशाली को छोड़कर सभी विधानसभा क्षेत्र मुजफ्फरपुर जिले में हैं। वैशाली लोकसभा में मतदाताओं की संख्या 17 लाख 18 हजार 311 है। राजपूत, यादव और भूमिहार जाति की संख्या सबसे अधिक है। विभिन्न उपजातियों को मिलाने के बाद अतिपिछड़ों और दलितों की संख्या अच्छी-खासी हो जाती है। यहां की साक्षरता दर 66 फीसद के आसपास है। हाजीपुर-सुगौली रेलपथ की आर्थिक बाधा अब दूर हुई है और अब निर्माण चल रहा है। देवरिया-मुजफ्फरपुर पथ का चयन एनएच के लिए हुआ है। कांटी थर्मल की दूसरी यूनिट की भी शुरुआत हुई। सांसद निधि से 142 छोटी-बड़ी सड़कों केनिर्माण का काम हुआ। कांटी से मीनापुर को जोड़नेवाले रघई पुल के पहुंच पथ की बाधा दूर हुई और पुल चालू हो गया है। मोतीपुर स्टेशन के विस्तार की योजना की शुरुआत हुई। सड़क, जलजमाव, सिंचाई, चीनी मिल जैसे स्थानीय मसले भी चुनाव में मायने रखेंगे। वैशाली अपने प्रारभिक काल से ही बिहार का महत्वपूर्ण लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र रहा है। इस लोकसभा क्षेत्र से वैशाली विधानसभा क्षेत्र समेत 6 क्षेत्रों को शामिल किया गया है। इस क्षेत्र से जीतकर दिल्ली पहुंचे कई समाजवादियों और कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने केंद्र सरकार में महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई है। लेकिन यह गौर करने वाली बात है कि इस प्रथम गणतंत्र की जननी की धरती पर कमल कभी नहीं खिल सका है। इसबार जब नवंबर में केंद्रीय गृहमंत्री व भाजपा के चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह एक रैली के दौरान जब मुजफ्फरपुर आए थे तो उन्होंने मंच से यह घोषणा की थी कि इसबार भाजपा स्वयं वैशाली से अपना उम्मीदवार उतरेगी। लेकिन नए गठबंधन के तहत फिर यह सीट लोजपा रामविलास के हिस्से में चली गई है। वहीं राजद ने इसबार वैशाली सीट पर मुन्ना शुक्ला को चुनाव मैदान में उतारा है। वही लोजपा आर ने यहां की सांसद विणा देवी को फिर से मौका दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आमने सामने की लड़ाई में यहां भाजपा का सहयोगी दल अपनी सीट बरकरार रख पाती है या फिर राजद अपनी खोई जमीन पर पुनः पांव जमाने में सफल होती है।




