समाचार संकलन इनका काम है,आखिर फील्ड रिपोर्टर ही निशाने पर क्यो?

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कार्यकारी संपादक पंकज कुमार ठाकुर

(कटाक्ष) संपादकीय

नई दिल्ली::–अग्निपथ योजना को लेकर पूरा देश सुलग रहा है। सिस्टम लाचार और बेबस हो चुकी है। आंदोलन के नाम पर जबरदस्त तांडव मच रहा है। देखते ही देखते कई सौ करोड़ की संपत्ति आग के हवाले। मैं पूछना चाहता हूं किसने हक दिया आपको, यह जनता के पैसे हैं, एक रुपए के शैंपू खरीदने पर भी जनता को टैक्स देना होता है और उन पैसों से सरकारी संपत्ति खरीदी जाती है। और यह संपत्ति किसी नेता की जागीर नहीं थी। कौन सा संविधान आंदोलन के नाम पर नंगा नाच करने की इजाजत देती है। कई ऐसे सवाल है भाजपा और जदयू के बीच में पूरा बिहार जल रहा है। बड़े-बड़े दिग्गज आकर ट्विटर बाजी कर रहे हैं। अरे हुजूर इन आंदोलनकारी के बीच में जाएं। दरअसल बिहार के दानापुर समेत कई जगह फिल्ड रिपोर्टरों को निशाना बनाया जा रहा है। आखिर यह कैसे आंदोलनकारी अब सवाल उठता है वातानुकूलित कमरे में बैठकर मौलाना और पंडित का डिबेट। एक फील्ड रिपोर्टर के लिए कोई मायने नहीं रखता, वातानुकूलित कमरे में बैठकर डिबेट करने वाले और एक जमीनी पत्रकार में जमीन आसमान का अंतर होता। फील्ड रिपोर्टरों का काम है। समाचार संकलन है। इन पर हमला किसी भी दृष्टिकोण से बर्दाश्त योग्य नहीं है। वैसे भी हमारा संविधान हिंसा की इजाजत कतई नहीं देता है। अब जरा आंदोलनकारी समझे आखिर एक जमीनी पत्रकार को समाचार संकलन करने में कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। सैकड़ों परेशानी होने के बावजूद उन्हें कोई खास तनख्वाह नहीं, आखिर इन पर हमला क्यों क्यों इनको टारगेट किया जा रहा है। याद रखें आज जो आपका आंदोलन है इन्हीं फिल्ड रिपोर्टरों की वजह से। जरा सोचिए क्या इन पर हमला उचित है? तो जनता के जेहन में अब कई ऐसे सवाल दौड़ने लगे हैं। आखिर इस हिंसा की ड्राइविंग सीट पर बैठा कौन है। फिलवक्त दो दलो के खिंचातान के बीच पूरा बिहार जल रहा है ‌ तो राजनीतिकरण की नई नई परिभाषा गढ़ने की तैयारी की जा रही है। अब ऐसे में नेताजी खुद आगे आकर उन आंदोलनकारियों को संभाले। राम ना करे मेरे राज्य को ऐसा नेता मिले, जो आप भी डूबे जनता को भी ले डूबे। बंद करें यह तमाशा पक्ष विपक्ष के नाम के खेल का। मुझे कहने में कोई गुरेज नहीं है। आने वाले दिनों में कई नेता की भविष्य इस आंदोलन ने दांव पर लगा दिया है। तो यूं कहें कई नेता जी के मन ही मन में लड्डू फूट रहे हैं। और लंबी कुर्सी के ख्वाब पाले हुए। जहां दिल्ली में उनकी औकात जीरो बटा सन्नाटा हो जाती है आकर।

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