दलालों के चंगुल में सदर अस्पताल!

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नवादा से अनिल शर्मा की रिपोर्ट


एंकर नवादा सदर अस्पताल इन दिनों दलालों के चंगुल में है। सदर अस्पताल से रेफर मरीजों को दलाल अपने झांसे में लेकर पटना के बड़े-बड़े प्राइवेट अस्पतालों में पहुंचा दे रहे हैं, जहां मरीजों के परिजन से खून पसीने की गाढ़ी कमाई को पल भर में उड़ा देते है। कुछ इसी तरह का मामला सदर अस्पताल में सामने आया है। बताया जा रहा है कि मुफस्सिल थाना क्षेत्र के झुनाठी गांव निवासी बाबूलाल राजवंशी के पुत्र विकास कुमार बीते 4 अप्रैल को सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से जख्मी हो गया था। परिजनों द्वारा जख्मी विकास को इलाज के लिए सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां से चिकित्सकों द्वारा चिंताजनक स्थिति में पावापुरी रेफर कर दिया गया। रिफर होने के बाद सदर अस्पताल के दलाल मरीज के परिजनों को अपने झांसे में लेकर प्राइवेट एंबुलेंस में बैठाकर पावापुरी ले जाने की बात कह उसे पटना के जीवन दीप अस्पताल में भर्ती करा दिया गया, जहां इलाज के नाम पर मरीज के परिजनों से इलाज के नाम पर 15 दिनों में 4.5 लाख रुपये ऐठ लिया गया। इतना करने के बाद भी जब मरीज की स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो डॉक्टर द्वारा और पैसे की मांग की गई। जब मरीज के परिजन रुपए देने में असमर्थता जाहिर की तो अस्पताल से मरीज को निकाल दिया गया। जिसके बाद कल रात्रि परिजन मरीज को लेकर पुनः सदर अस्पताल लेकर पहुंचा।
वही मरीज के भाई सुबोध कुमार ने बताया कि जबरदस्ती एंबुलेंस चालक हम लोगों को पटना जीवनदीप अस्पताल में ले जाकर फंसा दिया। उन्होंने बताया कि औकात से अधिक रुपए ब्याज पर लेकर भाई का इलाज कराते रहे। जब रुपए खत्म हो गया तो वहां से हमलोगों को निकाल दिया गया जिसके बाद सदर अस्पताल पहुंचे हैं।
आपको बता दें कि सदर अस्पताल में प्राइवेट एंबुलेंस का कब्जा है। जब कोई सीरियस मरीज सदर अस्पताल पहुंचता है तो उस पर प्राइवेट एंबुलेंस ड्राइवर और दलालों की गिद्ध नजर होती है। जैसे ही डॉक्टर द्वारा मरीज को पावापुरी या फिर पीएमसीएच रेफर किया जाता है, वैसे ही अस्पताल के दलाल और प्राइवेट एंबुलेंस चालक मरीज के परिजनों को अपने झांसे में लेकर बिहारशरीफ या फिर पटना के कोई निजी अस्पताल में भर्ती करा देता, जहां से उसे कमीशन के रूप में मोटी रकम मिलती है। यह पूरा खेल अस्पताल के डॉक्टर और के सामने होती है, लेकिन इस पर वे चुप्पी साध लेते हैं। जिससे साफ जाहिर होता है कि कमीशन का हिस्सा कहीं ना कहीं सदर अस्पताल के डॉक्टर के साथ पदाधिकारियों तक भी पहुंचती है।

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