:- रागिनी शर्मा की रिपोर्ट
विश्वप्रसिद्ध एवं शक्तिशाली भारतीय मौर्य राजवंश के महान चक्रवर्ती सम्राट अशोक राष्ट्रीय अस्मिता, राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह व भारतीयों के आत्मसम्मान से जुड़ा हुआ मसला है ।
पुस्तक के लेखक ने इतिहास को मिथक और मिथक को इतिहास बनाने की जो साजिश की है, उसके बचाव में आना विचारधारा की लड़ाई का अंग हो सकता है लेकिन राजनैतिक गठबंधन का नहीं ।
सम्राट अशोक पर आधारित नाट्य के भूमिका को पृष्ठ संख्या- 25 में ‘‘कामाशोक, चंडाशोक और धम्माशोक एक के बाद एक नहीं आये । वे तीनों, उसके शरीर में एक साथ, लगातार, जीवनपर्यन्त जीवित रहे । वह कामाशोक केवल नवायु में ही नहीं था । देवी के बाद उसके अन्त:पुर में पांच सौ स्त्रियाँ, फिर उसकी घोषित पत्नियाँ-असंधमित्ता, पद्मावती और कारुवाकी ! फिर वृद्धावस्था में तिष्यरक्षिता ! वह आजीवन काम से मुक्ति नहीं पा सका’’ (संदर्भ ‘सम्राट अशोक’ )
साथ ही साथ नाट्य के दृश्य-10 ‘अशोक-तिष्यरक्षित’ संदर्भ में जिसरूप में पेश किया गया है, वह किसी रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता है । (संदर्भ ‘सम्राट अशोक’)
ऐसे लिखने वाले को सम्राट अशोक के नाम पर ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार 2021’ दिया जाना ही सम्राट अशोक के प्रति अपमान एवं तिरस्कार का भाव दिखाता है ।
राजनैतिक बयान से महत्वूपर्ण यह है कि जिस लेखक ने सम्राट अशोक की गरिमा पर अपने नाट्क के माध्यम से अपमान किया है उस व्यक्ति से विभिन्न अवार्ड वापसी मुहिम में साथ दें ।




