रिपोर्टर– राजीव कुमार झा!
मुख्य बिंदु:
- भारतीय शिक्षा पद्धति, संस्कृति और संस्कार पर हुआ मंथन।
- ‘पंच परिवर्तन’ के माध्यम से सामाजिक जीवन में सकारात्मक बदलाव पर चर्चा।
- शिक्षक को राष्ट्र के चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला बताया।
- अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने शिक्षाविदों को किया संबोधित।
- जिले के सैकड़ों शिक्षाविद, शिक्षक एवं संघ के स्वयंसेवक रहे उपस्थित।
ऐंकर– मधुबनी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मधुबनी के तत्वावधान में रविवार को रांटी चौक स्थित चन्द्रा कॉम्प्लेक्स के सभागार में शिक्षाविद संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में जिले के विभिन्न क्षेत्रों से आए सैकड़ों शिक्षाविदों, शिक्षक-शिक्षिकाओं एवं संघ के स्वयंसेवकों की सहभागिता रही। कार्यक्रम का मुख्य विषय भारतीय दृष्टिकोण पर आधारित शिक्षा, संस्कृति, संस्कार एवं राष्ट्रीय चेतना रहा।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी ने शिक्षा और संस्कृति के माध्यम से विद्यार्थियों में राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध विकसित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल किताबी ज्ञान प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति के भीतर संस्कार, सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्र के प्रति चेतना का निर्माण होता है। शिक्षा और संस्कृति के माध्यम से राष्ट्र के प्रति कर्तव्य बोध का निर्माण करने में एक शिक्षक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और बुनियादी होती है। शिक्षक केवल पुस्तकीय ज्ञान देने वाला माध्यम नहीं है, बल्कि वह राष्ट्र के चरित्र का निर्माता होते हैं। संस्कृति हमारे राष्ट्र की आत्मा है और शिक्षा उस आत्मा को पहचानने का मार्ग है।
उन्होंने कहा कि शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व एवं चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारतीय संस्कृति को राष्ट्र की आत्मा बताते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों को अपनी संस्कृति, परंपरा और जीवन-मूल्यों को समझने का अवसर मिलना चाहिए।
संगोष्ठी में ‘पंच परिवर्तन’ की अवधारणा को भी प्रमुखता से रखा गया। इसके अंतर्गत कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी आचरण, सामाजिक समरसता एवं नागरिक कर्तव्य जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।
•सामाजिक समरसता: समाज के हर वर्ग में ऊंच-नीच और जातिगत भेदभाव को समाप्त कर एकात्मता का भाव जगाना।
•पर्यावरण संरक्षण: जल संरक्षण, प्लास्टिक का कम से कम उपयोग और व्यापक वृक्षारोपण के माध्यम से प्रकृति की रक्षा करना।
•कुटुंब प्रबोधन: बिखरते परिवारों को बचाना और पारिवारिक संस्कारों के माध्यम से बच्चों में नैतिक मूल्यों का विकास करना।
•स्व आधारित जीवन: अपनी भाषा, अपनी भूषा, अपनी संस्कृति, स्वदेशी वस्तुओं और अपनी जड़ों पर गौरव करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना।
•नागरिक कर्तव्य बोध: अधिकारों की बात करने से पहले राष्ट्र के प्रति अपने नियमों, कानूनों और नागरिक कर्तव्यों का कड़ाई से पालन करना।
वक्ता ने कहा की “एक शिक्षक के नाते हमारी भूमिका यह सुनिश्चित करता है कि पंच परिवर्तन का यह संदेश केवल व्याख्यानों तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे आचरण और कक्षाओं के माध्यम से विद्यार्थियों के जीवन का हिस्सा बने।” राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष की यह यात्रा सेवा, समर्पण और राष्ट्र निर्माण की अद्वितीय गाथा है, जिसे अब इस पंच परिवर्तन के माध्यम से समाज के अंतिम छोर तक ले जाना है। कार्यक्रम में क्षेत्र के सैकड़ों प्रबुद्ध शिक्षकों, प्राचार्यों और शिक्षाविदों ने भाग लेकर इस राष्ट्रीय पुनरुत्थान के कार्य में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने का संकल्प लिया।
वक्ताओं ने इन विषयों को सामाजिक जीवन एवं शिक्षा से जोड़कर विद्यार्थियों में जिम्मेदारी की भावना विकसित करने की आवश्यकता पर विचार रखा।
कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन एवं आचार्यों के द्वारा वैदिक स्वस्तिवाचन के साथ हुई। कार्यक्रम के संचालन एवं आयोजन में जिला शिक्षक कार्य प्रमुख मनोज कुमार झा, जिला संघचालक अरविंद कुमार सिन्हा, जिला कार्यवाह डाॅ० केशव चंद्र झा सहित अन्य कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। संगोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता एवं स्वयंसेवकों के साथ जिले के विभिन्न क्षेत्रों से आए शिक्षाविदों की उपस्थिति रही।
संगोष्ठी के माध्यम से शिक्षा को ज्ञान के साथ संस्कार, संस्कृति, सामाजिक दायित्व एवं राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया।



