नयका कोरोना अफ्रीका से पहुंच चुका है, बाकी क्या कोरेंटिन आइसोलेशन के नाम पर खेला होबे?

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पंकज कुमार ठाकुर

कुछ शब्द फिर वापस लौट रहे हैं-
मास्क, सैनिटाइजर, कोविड सेंटर, क्वारंटाइन, आइसोलेशन, गिलोय, इम्युनिटी…!
मास्क-सैनिटाइजर, दवाई, विटामिन सी की गोली, इम्युनिटी बुस्टर का बचा स्टॉक तड़ाक से बिक जाएगा अब तो? पीके फिल्म में यही तो बताया गया था कि कुछ बेचना है तो डर पैदा कीजिए। बाकी कोविड सेंटर, क्वारंटाइन, आइसोलेशन के नाम पर भी खेला होबे।

खैर, तर्क-प्रतितर्क के बीच में फँसा हूँ। मेरे जैसे कई और लोग द्वंद्व में जी रहे होंगे कि कोरोना से डरना है या नहीं, डरना है तो कितना डरना है…! परिवार की समाज की चिंता कहती है कि सतर्कता तो बरतनी ही है। हालांकि यहां फिर प्रतितर्क आ जाता है कि क्या दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करने वाले हम मध्यमवर्गीय या गरीब लोग अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार से अधिक सतर्कता बरत सकते हैं?

दो जून की रोटी से ध्यान आया। अब तो स्थिति यह आ गई कि कमाएंगे तो खाएंगे। और कमाएंगे कैसे? बाहर कोरोना के नाम पर हमें खाने के लिए कई लोग बैठे हैं। कभी धंधा बंद करने के नाम पर वसूली, कहीं मास्क नहीं पहनने के नाम पर वसूली…! दो गज दूरी मास्क है जरूरी… यह कैफियत इतनी बार सुना जा चुका है कि लोग शायद ही ताउम्र भूलें। हालांकि मास्क से कोरोना नहीं होगा, इससे संबंधित कोई शोध रिपोर्ट आज तक हमारे समाने से नहीं गुजरी, जबकि कई जानकारों ने बताया कि मास्क में जितने माइक्रोन का छिद्र होता है कोरोना तो उससे भी सौ गुणा कम का होता है।

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