पहला मुद्दा जवाबदेही का संकट, दूसरा शिक्षा का बाजारीकरण, तीसरा कैम्पस में दमन – माले विधायक संदीप सौरभ!

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रिपोर्ट – अमित कुमार

आज हम यहाँ किसी पार्टी के लिए नहीं, देश के करोड़ों छात्रों और उनके भविष्य के लिए खड़े हुए हैं।

पिछले कुछ महीनों में जो कुछ हुआ है उसने पूरे देश के छात्र-युवा को सड़क पर उतरने पर मजबूर कर दिया है।

पहला मुद्दा: जवाबदेही का संकट
NEET, CUET, NET जैसी राष्ट्रीय परीक्षाओं में पेपर लीक, धांधली और गड़बड़ी लगातार सामने आ रही हैं। लाखों छात्र रात-दिन मेहनत करते हैं, फॉर्म भरते हैं, सेंटर तक जाते हैं — और आखिर में पता चलता है कि सिस्टम ही बिक गया। जब शिक्षा मंत्री से सवाल पूछा जाता है तो जवाब मिलता है “छोटी-मोटी गड़बड़ी”। क्या छात्रों का भविष्य “छोटी-मोटी” बात है?

दूसरा मुद्दा: शिक्षा का बाजारीकरण
केंद्रीय विश्वविद्यालयों, IIT, IIM में फीस बेतहाशा बढ़ रही है। स्कॉलरशिप रोकी जा रही है। सरकारी स्कूल-कॉलेजों को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है ताकि निजी कोचिंग और प्राइवेट यूनिवर्सिटी का धंधा चमके। गरीब, दलित, पिछड़े और ग्रामीण इलाके के बच्चे उच्च शिक्षा से बाहर हो रहे हैं।

तीसरा मुद्दा: कैंपस में दमन
JNU, HCU, पटना यूनिवर्सिटी से लेकर देशभर में छात्र नेताओं पर केस, हॉस्टल खाली कराना, विरोध की आवाज दबाना — ये नया सामान्य बन गया है। AISA के साथी धनंजय खुद इसका उदाहरण हैं। छात्रसंघों को खत्म करने की साजिश चल रही है ताकि कोई सवाल ही न पूछे।

इन सबका सीधा मतलब है: शिक्षा नीति फेल है और इसकी राजनीतिक जिम्मेदारी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान जी की है।

एक मंत्री तब तक कुर्सी पर नहीं रह सकता जब तक देश के युवा सड़कों पर हों, आत्महत्या कर रहे हों, और परीक्षाओं के लिए न्याय मांग रहे हों। इसलिए हमारी स्पष्ट मांग है: धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें और संसद में शिक्षा पर विशेष चर्चा हो।

आगे की रणनीति: हम बिहार से लेकर दिल्ली तक छात्र पंचायत करेंगे, विश्वविद्यालयों में हस्ताक्षर अभियान चलाएंगे और 15 अगस्त के बाद संसद घेराव की तैयारी है। यह लड़ाई किसी एक घटना की नहीं है। यह सवाल है कि हम किस तरह की शिक्षा और किस तरह का देश चाहते हैं।

शिक्षा को व्यापार नहीं, अधिकार बनाना होगा।

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